सितंबर में FPI की भारी बिकवाली, लार्ज-कैप शेयरों पर बढ़ी नजर
मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली सितंबर में काफी तेज रही। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने महीने के दौरान भारतीय इक्विटी बाजार से कुल 45,536 करोड़ रुपए की निकासी की। हालांकि, उनकी भारत में निवेश की दिलचस्पी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसका संकेत प्राथमिक बाजार से मिला, जहां एफपीआई ने सितंबर में 9,676 करोड़ रुपए का निवेश किया।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी निवेशकों के रुख पर सबसे बड़ा दबाव अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड के 5.2 प्रतिशत से ऊपर पहुंचने और कच्चे तेल की कीमतों के लंबे समय तक ऊंचे रहने की आशंका से आया है। इन वैश्विक परिस्थितियों ने उभरते बाजारों में निवेश को लेकर विदेशी निवेशकों की सतर्कता बढ़ा दी है।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी.के. विजयकुमार के अनुसार, लगातार विदेशी बिकवाली ने भारतीय बाजार की धारणा को कमजोर किया है। इसी दबाव के बीच बाजार लगातार आठ सप्ताह तक गिरावट के साथ बंद हुआ। उन्होंने कमजोर मानसून को भी बाजार के लिए चिंता का कारण बताया। इस साल बारिश सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम रही, जिसका असर निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ा है।
हालांकि, बाजार में लगातार करेक्शन के बाद तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। बड़ी कंपनियों यानी लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन अब पहले की तुलना में ज्यादा आकर्षक नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत कारोबारी आधार वाली बड़ी कंपनियों में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अवसर बन सकते हैं।
सितंबर के अंतिम दिनों में एफपीआई की निकासी और तेज हो गई। 28 सितंबर से 1 अक्टूबर के बीच महज चार कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों की अस्थायी इक्विटी बिकवाली करीब 34,965 करोड़ रुपए रही। वहीं, इसी अवधि में रिपोर्ट की गई निर्धारित इक्विटी बिकवाली 27,962 करोड़ रुपए रही। इससे संकेत मिला कि महीने के अंत और अक्टूबर की शुरुआत में विदेशी निवेशकों का दबाव और बढ़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि एफपीआई की बिकवाली थमने या विदेशी पूंजी की वापसी के लिए वैश्विक स्तर पर कुछ सकारात्मक संकेत जरूरी होंगे। इनमें कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट सबसे अहम मानी जा रही है। जुलाई और अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में संभावित गिरावट की उम्मीद से विदेशी निवेशकों का रुख कुछ बेहतर हुआ था, लेकिन यह बदलाव ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका।
चॉइस वेल्थ के मुख्य निवेश रणनीति अधिकारी धीरज गौर ने कहा कि द्वितीयक बाजार में बिकवाली के साथ प्राथमिक बाजार में निवेश जारी रहना बताता है कि विदेशी निवेशक भारत से पूरी तरह बाहर नहीं निकल रहे हैं। वे निवेश के लिए कंपनियों और अवसरों का ज्यादा सावधानी से चयन कर रहे हैं। उनके मुताबिक यह प्रवृत्ति अक्टूबर में भी जारी रह सकती है।
इस बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाजार को मजबूत सहारा दिया। सितंबर 2026 में डीआईआई ने नकद इक्विटी बाजार में 76,030 करोड़ रुपए की खरीदारी की। घरेलू संस्थागत निवेशकों के साथ खुदरा निवेशकों की खरीदारी ने विदेशी पूंजी की निकासी के असर को काफी हद तक सीमित रखा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर घरेलू निवेशकों का यह समर्थन नहीं मिलता, तो भारतीय शेयर बाजार में गिरावट और गहरी हो सकती थी। अब आगे बाजार की दिशा काफी हद तक वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजों पर निर्भर करेगी।
विश्लेषकों की नजर उन कंपनियों पर रहेगी, जिनके दूसरी तिमाही के नतीजे बाजार की उम्मीदों से बेहतर आते हैं। साथ ही, जिन कंपनियों का प्रबंधन भविष्य की कमाई और कारोबार को लेकर सकारात्मक संकेत देगा, उनके शेयरों में खरीदारी बढ़ सकती है। ऐसे में विदेशी बिकवाली के बीच मजबूत घरेलू निवेश और आकर्षक लार्ज-कैप वैल्यूएशन बाजार के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन सकते हैं।