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एआई से बढ़ेगी रफ्तार, रोजगार पर रहेगी चुनौती

एआई से बढ़ेगी रफ्तार, रोजगार पर रहेगी चुनौती

नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई तेजी से दुनिया के काम करने के तरीके को बदल रहा है। ग्राहक सेवा से लेकर मेडिकल डायग्नोसिस, कोडिंग और कंटेंट तैयार करने तक कई क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। इससे कंपनियों की उत्पादकता और काम की गति बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन इसके साथ रोजगार को लेकर चिंता भी सामने आ रही है।

एक रिपोर्ट में चेताया गया है कि किसी भी बड़ी तकनीकी क्रांति का फायदा तुरंत समाज के हर वर्ग तक नहीं पहुंचता। एआई के मामले में भी यही स्थिति बन सकती है। उत्पादकता और कंपनियों की कमाई तेजी से बढ़े, लेकिन आम कामगारों की आय और जीवन स्तर में सुधार आने में समय लगे, तो इसका असर सामाजिक असमानता पर पड़ सकता है।

‘इंडिया नैरेटिव’ में प्रकाशित एक लेख में आर्थिक इतिहास के संदर्भ में इसे ‘एंगेल्स पॉज’ से जोड़ा गया है। इसका आशय उस दौर से है, जब तकनीकी प्रगति के कारण उत्पादन और संपत्ति में वृद्धि तो होती है, लेकिन कामगारों की आय और जीवन स्तर में उसका लाभ तुरंत दिखाई नहीं देता।

इसके लिए ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति का उदाहरण दिया गया है। 19वीं सदी में औद्योगिक उत्पादन में बड़ी तेजी आई, लेकिन मजदूरों की आमदनी और जीवन स्थितियों में सुधार उतनी तेजी से नहीं हुआ। बाद में श्रमिक आंदोलनों, श्रम अधिकारों और सामाजिक कल्याण की नीतियों के जरिए इस असंतुलन को कम करने की कोशिश की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली तकनीकी क्रांतियों में नए उद्योगों के पैदा होने से बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी बने। औद्योगिक क्रांति ने फैक्ट्रियों को बढ़ावा दिया, ऑटोमोबाइल उद्योग ने विनिर्माण और सर्विस सेक्टर में नौकरियां पैदा कीं और डिजिटल क्रांति के बाद सॉफ्टवेयर, ई-कॉमर्स तथा प्लेटफॉर्म आधारित अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हुई।

एआई भी आने वाले समय में ऐसे नए रोजगार और पेशे पैदा कर सकता है, जिनकी आज शायद कल्पना भी नहीं की जा रही है। लेकिन इस बदलाव तक पहुंचने का संक्रमण काल आसान नहीं होगा। खासकर वे काम, जिन्हें एआई कम समय और कम लागत में कर सकता है, उनमें रोजगार के स्वरूप में बदलाव की संभावना अधिक है।

भारत के लिए यह चुनौती और अवसर दोनों लेकर आया है। देश ने आईटी आउटसोर्सिंग, बिजनेस प्रोसेस मैनेजमेंट और कस्टमर सपोर्ट जैसे सेवा क्षेत्रों में वैश्विक पहचान बनाई है। लेकिन बेसिक कोडिंग, डेटा एंट्री, ग्राहक सहायता और दस्तावेजों की प्रोसेसिंग जैसे कई काम अब एआई आधारित सिस्टम तेजी से कर सकते हैं।

इसके बावजूद एआई को केवल रोजगार के खतरे के रूप में देखना सही नहीं होगा। रिपोर्ट के अनुसार, भारत कृषि उत्पादकता बढ़ाने, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुधारने, लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने और शिक्षा को अधिक लोगों तक पहुंचाने में इसका इस्तेमाल कर सकता है। शासन व्यवस्था में भी एआई का उपयोग सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।

भारत में कई स्टार्टअप पहले से ही फिनटेक, भाषा तकनीक और दूसरे क्षेत्रों में एआई आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं। ऐसे में तकनीक को अपनाने के साथ यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि उसका लाभ केवल बड़ी कंपनियों या कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित न रह जाए।

रिपोर्ट में नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी संतुलन को बनाए रखने की बताई गई है। अगर एआई से उत्पादकता बढ़ती है, तो उससे पैदा होने वाले आर्थिक लाभ का हिस्सा व्यापक समाज तक पहुंचना भी जरूरी है। इसके लिए रोजगार बाजार में होने वाले बदलावों की पहले से पहचान करनी होगी।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बड़े स्तर पर डिजिटल शिक्षा, अपस्किलिंग और री-स्किलिंग कार्यक्रमों में निवेश इस बदलाव को आसान बना सकता है। विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों को भी पुराने पाठ्यक्रमों पर निर्भर रहने के बजाय नई तकनीक और बदलती नौकरियों के अनुरूप प्रशिक्षण देना होगा।

इसके साथ ही उन कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी, जिनकी नौकरियां या काम करने का तरीका एआई के कारण प्रभावित हो सकता है। असल चुनौती एआई को रोकने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें तकनीकी तरक्की के साथ रोजगार के अवसर, कौशल और सामाजिक सुरक्षा भी आगे बढ़ें।

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