नियंत्रित अनिश्चितता के दौर में अमेरिका और चीन
- महेन्द्र तिवारी
वैश्विक राजनीति के वर्तमान दौर में अमेरिका और चीन के बीच बीजिंग में आयोजित हुई उच्च स्तरीय बैठक को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व एक जटिल और अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है, जहां क्षेत्रीय संघर्ष, ऊर्जा क्षेत्र की अस्थिरता, आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितताएं और तकनीकी क्षेत्र में वर्चस्व की होड़ ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भारी दबाव पैदा कर दिया है। ऐसी परिस्थितियों में दुनिया की 2 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेताओं का एक मंच पर आना और संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना अपने आप में एक बड़ा संदेश देता है। हालांकि, यदि इस बैठक के वास्तविक और व्यावहारिक परिणामों का मूल्यांकन किया जाए, तो वे जनसाधारण और विश्लेषकों की अपेक्षाओं से काफी सीमित रहे हैं। दोनों पक्षों ने वैश्विक समुदाय को यह दिखाने का पूरा प्रयास किया कि वे सीधे सैन्य या राजनीतिक टकराव के बजाय संबंधों में स्थिरता और एक नियंत्रित प्रतिस्पर्धा के ढांचे के भीतर काम करना चाहते हैं। इस वार्ता के दौरान बातचीत का लहजा भले ही कूटनीतिक शिष्टाचार से परिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण रहा हो, लेकिन जब बात बुनियादी रणनीतिक मतभेदों और दीर्घकालिक विवादों पर ठोस सहमति बनाने की आई, तो वहां कोई बड़ा बदलाव या ऐतिहासिक मोड़ देखने को नहीं मिला। यही कारण है कि इस पूरी कूटनीतिक कवायद को एक बड़े बदलाव की शुरुआत मानने के बजाय वैश्विक संतुलन को बनाए रखने का एक अस्थायी प्रयास माना जा रहा है।
इस पूरी वार्ता के केंद्र में दोनों महाशक्तियों के बीच के आर्थिक और व्यापारिक संबंध रहे, जो पिछले कई वर्षों से गंभीर तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। दोनों देशों के नेतृत्व ने इस यथार्थ को पूरी गंभीरता से स्वीकार किया कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक ढांचे की स्थिरता इन दोनों के आपसी संबंधों पर टिकी है। अमेरिका और चीन जैसी 2 विशाल आर्थिक शक्तियों के बीच व्यापारिक संबंधों का पूरी तरह से टूट जाना न तो इन दोनों देशों के हित में होगा और न ही शेष विश्व इसके आर्थिक झटके को झेलने में सक्षम है। इसी समझ के आधार पर बैठक के दौरान कुछ सीमित आर्थिक संकेतों और समझौतों पर चर्चा आगे बढ़ी, जिनमें मुख्य रूप से कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद, ऊर्जा व्यापार में सहयोग की संभावनाएं और विमानन उद्योग से जुड़े कुछ संभावित सौदे शामिल रहे। कुछ कूटनीतिक विवरणों से यह भी संकेत मिले कि चीन आने वाले समय में अमेरिकी कृषि उत्पादों और नागरिक उड्डयन क्षेत्र को 1 बड़ा क्रय प्रस्ताव देने पर विचार कर सकता है। लेकिन इन तमाम सकारात्मक चर्चाओं के बावजूद यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये सभी कदम अभी बेहद शुरुआती और प्रारंभिक स्तर पर हैं। इन्हें किसी औपचारिक, व्यापक या दीर्घकालिक व्यापार समझौते का रूप नहीं दिया जा सका है, जो दोनों देशों के व्यापारिक असंतुलन को स्थाई रूप से दूर कर सके।
व्यापारिक स्तर पर सहयोग की इस धीमी सुगबुगाहट के समांतर सबसे जटिल और विवादित विषय सीमा शुल्क और तकनीकी प्रतिबंधों का बना रहा। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापार युद्ध और एक-दूसरे के उत्पादों पर लगाए गए भारी करों को कम करने की दिशा में इस बैठक से कोई ठोस और स्पष्ट कार्ययोजना सामने नहीं आ सकी। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस उच्च स्तरीय बैठक का प्राथमिक उद्देश्य किसी नए या आदर्श वैश्विक व्यापार ढांचे की स्थापना करना था ही नहीं, बल्कि इसका तात्कालिक लक्ष्य मौजूदा आर्थिक तनाव को एक सीमा से अधिक बढ़ने से रोकना था। इस दृष्टिकोण से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह वार्ता कूटनीतिक मोर्चे पर एक प्रकार के अस्थायी विराम की तरह काम कर रही है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सीधे आर्थिक महायुद्ध से बचने का मार्ग तलाश रहे हैं।
इस पूरी बीजिंग वार्ता का सबसे संवेदनशील, जटिल और रणनीतिक रूप से खतरनाक विषय ताइवान का मुद्दा रहा। चीन ताइवान को अपनी मुख्य भूमि का अटूट हिस्सा और अपने संप्रभु क्षेत्र का एक अनिवार्य अंग मानता है, जबकि इसके विपरीत अमेरिका ताइवान के साथ मजबूत रणनीतिक, कूटनीतिक और रक्षा संबंध बनाए हुए है। इस मुद्दे पर चीनी पक्ष की ओर से अत्यंत कड़े और स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दिया गया कि यदि ताइवान को लेकर स्थिति में कोई भी नकारात्मक बदलाव हुआ या अंतरराष्ट्रीय शक्तियों द्वारा स्थापित सीमाओं का उल्लंघन किया गया, तो दोनों महाशक्तियों के संबंध एक अत्यंत गंभीर संकट में फंस सकते हैं। दूसरी ओर, अमेरिकी कूटनीति ने भी अपनी पारंपरिक नीति में किसी बड़े या क्रांतिकारी बदलाव का संकेत नहीं दिया। अमेरिका ने स्थिति को जानबूझकर रणनीतिक रूप से खुला रखने और अपनी पुरानी स्थिति पर अडिग रहने का दृष्टिकोण अपनाया। यह परस्पर विरोधी रुख साफ तौर पर यह दर्शाता है कि ताइवान का मुद्दा आने वाले समय में भी संपूर्ण एशिया प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा का सबसे बड़ा संकट बना रहेगा और निकट भविष्य में इसका कोई शांतिपूर्ण या सर्वमान्य समाधान निकलने की संभावना बेहद कम है।
आधुनिक युग की महाशक्ति बनने की दौड़ में तकनीकी क्षेत्र का नियंत्रण एक निर्णायक कारक साबित हो रहा है, और इस बैठक में भी तकनीकी प्रतिस्पर्धा का तनाव पूरी तरह उभरकर सामने आया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अर्धचालक उद्योग, उन्नत चिप निर्माण तकनीक और वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर नियंत्रण जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर दोनों पक्षों के बीच गहन चर्चा तो हुई, लेकिन किसी भी विषय पर कोई ठोस, लिखित या दीर्घकालिक समझौता नहीं हो सका। वैश्विक तकनीकी बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही इन दोनों शक्तिशाली देशों की प्रतिबंधात्मक नीतियों, निर्यात नियंत्रणों और सुरक्षा कानूनों से गहराई से प्रभावित हैं। इस बैठक के परिणामों से यह साफ है कि आने वाले समय में उन्नत तकनीकों के विकास और उनके बाजार पर कब्जे को लेकर यह होड़ थमने वाली नहीं है, बल्कि इसके और अधिक तीव्र होने की पूरी आशंका है।
इस बीजिंग बैठक का एक और महत्वपूर्ण आयाम यह है कि इसे केवल 2 देशों के द्विपक्षीय संबंधों के चश्मे से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके गहरे वैश्विक संदर्भ और निहितार्थ हैं। वर्तमान में कच्चे तेल के बाजार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों का प्रतिकूल प्रभाव पहले से ही दिखाई दे रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में यदि अमेरिका और चीन के बीच का तनाव किसी भी स्तर पर अनियंत्रित होता है, तो वह वैश्विक स्तर पर महंगाई, मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी को अत्यधिक बढ़ा सकता है। यही कारण है कि दोनों देशों के जिम्मेदार नेताओं ने दुनिया को यह आश्वस्त करने का प्रयास किया कि वे एक विनाशकारी संघर्ष के बजाय एक नियम-आधारित और संतुलित प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देंगे।
हालांकि इस संपूर्ण कूटनीतिक कवायद के पीछे का एक कड़वा यथार्थ यह भी है कि दोनों महाशक्तियों के बीच आपसी विश्वास का स्तर ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। गहरी आर्थिक अंतर्निर्भरता के बावजूद रणनीतिक, वैचारिक और भू-राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद इतने गहरे और मौलिक हैं कि किसी भी बड़े या स्थाई समझौते तक पहुंचना व्यावहारिक रूप से असंभव प्रतीत होता है। यही कारण है कि कूटनीतिक मामलों के जानकार इस बैठक को किसी स्थाई शांति समझौते के रूप में नहीं, बल्कि केवल एक अस्थाई स्थिरता लाने के प्रयास के रूप में देखते हैं। वैश्विक राजनीति में यह स्थिति एक नई प्रवृत्ति को रेखांकित करती है, जहां सहयोग और टकराव दोनों समानांतर रूप से चलते हैं और कोई भी पक्ष अपने मूलभूत हितों से पीछे हटने को तैयार नहीं होता।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी वास्तविकता यह है कि अब वैश्विक शक्ति का संतुलन एकध्रुवीय नहीं रह गया है। पिछले 1 या 2 दशकों में चीन का आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक प्रभाव अभूतपूर्व गति से बढ़ा है, जबकि अमेरिका अभी भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली और पारंपरिक सैन्य शक्ति के मामले में दुनिया में अग्रणी स्थान पर बना हुआ है। इस कारण दोनों देशों के बीच की यह प्रतिस्पर्धा केवल व्यापारिक मुनाफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी वैचारिक और रणनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। चूंकि इस समय दोनों में से कोई भी पक्ष दूसरे पर एकतरफा या निर्णायक बढ़त बनाने की स्थिति में नहीं है, इसलिए इस प्रकार की उच्च स्तरीय वार्ताएं अक्सर बेहद सीमित और प्रतीकात्मक परिणामों पर ही समाप्त होती हैं। अंततः इस बैठक का निष्कर्ष यही निकाला जा सकता है कि यह किसी नए युग का सूत्रपात नहीं है, बल्कि यह मौजूदा तनावपूर्ण संतुलन को सावधानीपूर्वक बनाए रखने का एक गंभीर प्रयास है ताकि दुनिया को किसी बड़े संकट से बचाया जा सके।