बचकर रहिए, मौसम बदलते ही बढ़ा सर्पदंश का खतरा
-बाल मुकुन्द ओझा
बरसात का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ सांपों का खतरा भी बढ़ जाता है. लगातार बारिश से बिलों में पानी भरने पर सांप सुरक्षित और सूखी जगहों की तलाश में घरों, खेतों और पशुशालाओं तक पहुंच जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बारिश के मौसम में देशभर में सर्पदंश की घटनाएं बढ़ गई है। सर्पदंश से होने वाली मौतों को जागरूकता के साथ रोका जा सकता है, बशर्तें आप किसी झाड़ फूंक के चक्कर में नहीं फंसे। बारिश के मौसम में अत्यधिक गर्मी और उमस से सर्प अपना बिल छोड़ देते है और इसी कारण सर्पदंश की घटनाएं होने लगती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में आये दिन कहीं न कहीं सर्पदंश की घटनाएं हो रही है। अनेक स्थानों पर लोगों की जान जा रही है। अभी तक खेतो में जंगलों में सर्पदंश की घटनाएं सुनने मिलती थी लेकिन देखने मे आ रहा है कि अब सांप घरों में घुसकर काट रहे हैं। चिकित्सकों के मुताबिक सर्पदंश के बाद व्यक्ति को भागना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे रक्त का संचार बढ़ने से जहर तेजी से फैलने लगता है। घटना के बाद व्यक्ति को तुरंत बैठ जाना चाहिए और डसने वाले स्थान पर पांच से छह इंच ऊपर कपड़ा बांध देना चाहिए, ताकि जहर आगे न बढ़े। तत्काल पीड़ित को ऐसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए जहां एंटी स्नेक वेनम के अतिरिक्त सांस और दिल के सहायता संबंधी उपकरण उपलब्ध हों।
जब कोई साँप किसी को काट लेता है तो इसे सर्पदंश या साँप का काटना कहते हैं। विषैले सांपों के सर्पदंश से कुछ ही मिनटों में मृत्यु तक हो सकती है। कुछ साँप विषैलें होते और कुछ विषैले नही होते हैं। देश और दुनियां में विषैले सर्प भी कई प्रकार के होते हैं। विषैले साँपों की प्रजातियों में कोबरा, काला नाग, नागराज, करैत, कोरल वाइपर, रसेल वाइपर, ऐडर, डिस फालिडस, मॉवा, वाइटिस गैवौनिका, रैटल स्नेक, क्राटेलस हॉरिडस आदि हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में सर्प की 240 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं। बारिश के मौसम में सांप के बिलों में पानी भर जाने से वे बाहर आकर सुरक्षित स्थान तलाशते हैं। ऐसे में कई बार वे हमारे घरों में घुसकर आश्रय खोजते हैं। ऐसे हालात में सर्पदंश की घटनाएं बढ़ जाती हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि सर्पदंश के मामले में लापरवाही न बरतें और तुरंत नजदीकी अस्पताल या डिस्पेंसरी के आपातकालीन वार्ड में पीड़ित का इलाज कराएं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक पूरी दुनिया में हर वर्ष सवा लाख के करीब लोग सांप के काटने से मर जाते हैं। मृतकों में करीब आधे भारतीय होते हैं। हमारे यहां हर वर्ष करीब 50 हजार लोग सर्पदंश के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। इनमें से 60 फीसदी मौतें अकेले जून से सितंबर के महीनों में होती हैं। इनमें से भी 97 फीसदी मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में जबकि तीन फीसदी मौतें शहरी क्षेत्रों में होती हैं। राष्ट्रीय प्रतिनिधि मृत्यु दर अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले 20 वर्षों में सर्पदंश से मरने वालों की संख्या 12 लाख दर्ज की गई है। बताया गया है कि भारत में अधिकांश मृत्यु जहरीले रसेल वाइपरस क्रिटस तथा कोबरा जैसे साँपों के काटने से होती हैं। इनमें से अधिकतर मामलों में लोग सांप के जहर से नहीं बल्कि डर और अंधविश्वास के कारण मरते हैं। देश के नौ राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश के कारण लगभग 70 प्रतिशत मौतें देखी गई है, जिनमें बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश तेलंगाना, राजस्थान तथा गुजरात राज्यों के ग्रामीण क्षेत्र शामिल है।
पक्षी विज्ञानियों के मुताबिक सर्प बहरा होने के कारण सुनते नहीं हैं। आंखों के सहारे हिलती-डुलती चीज को देखकर और धरती के कंपन के अनुमान पर आक्रमण करते हैं। जानकार बताते हैं कि जुलाई के महीने में कोबरा, करैत आदि सांपों का प्रजनन काल होता है। वह मादा के साथ जोड़े बनाते हैं तब आस-पास किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते। ऐसे समय में वह आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे में तीन माह तक विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। सर्प जब हमलावर दिखें तो भागने की बजाय उस पर कपड़ा या रूमाल फेंकना चाहिए। जिससे वह उसमें फंस जाएं।