अब मध्य प्रदेश में यूसीसीः भाजपा शासित राज्यों की बदलती तस्वीर
-संजय सक्सेना
भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मुद्दा लंबे समय से संवैधानिक और राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को यह निर्देश दिया गया है कि वह भारत के समस्त नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करे। इसी क्रम में, मध्य प्रदेश सरकार अब अपने राज्य में इसे लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया था, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई ने की। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री मोहन यादव को सौंप दी है। राज्य सरकार इस विधेयक को आगामी मानसून सत्र में पेश कर सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समिति ने अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को इस कानून के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 21 फीसदी हैं। सरकार का तर्क है कि यह कानून विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों में सभी के लिए एक समान नियम सुनिश्चित करेगा। गौरतलब हो, उत्तराखंड आधिकारिक रूप से देश का वह पहला राज्य है, जिसने स्वतंत्रता के बाद समान नागरिक संहिता को विधायी प्रक्रिया के माध्यम से लागू किया है। उत्तराखंड में यह कानून 27 जनवरी 2025 से प्रभावी हुआ। इसके अलावा, गोवा में लंबे समय से पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 लागू है, जिसे अक्सर यूसीसी के एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में देखा जाता है। गुजरात भी उन राज्यों की सूची में शामिल है, जिसने यूसीसी विधेयक पारित किया है। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में, राज्य सरकार ने कई बार यूसीसी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि उत्तर प्रदेश भी उत्तराखंड की तर्ज पर इस दिशा में कदम उठा सकता है, हालांकि अभी वहां कोई अंतिम ड्राफ्ट कानून का रूप नहीं ले पाया है।
सबसे पहले उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद, वहां नागरिक मामलों में एक नई कानूनी व्यवस्था बनी है। इसके प्रभाव को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं। समर्थकों का मानना है कि इससे लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा, विशेषकर विरासत और संपत्ति के अधिकारों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलेगा। कानूनी प्रक्रियाओं का सरलीकरण और धर्म-आधारित पर्सनल लॉ की जगह एक साझा कानून की उपस्थिति को सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है। दूसरी ओर, लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण और उससे जुड़े नियमों पर बहस भी जारी है। आलोचकों का तर्क है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता प्रभावित हो सकती है। जहां तक यूसीसी के उल्लंघन के लिए किसी कार्रवाई का प्रश्न है, चूंकि यह कानून अभी बहुत नया है और इसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया चल रही है, इसलिए इसके तहत दंड या सख्त कानूनी कार्रवाई की व्यापक खबरें अभी शुरुआती दौर में ही हैं। अधिकांश ध्यान अभी कानूनों को समझने और उनके पंजीकरण पर केंद्रित है। भारतीय जनता पार्टी यूसीसी को अपने मुख्य एजेंडे में रखती आई है। पार्टी का मानना है कि यह देश में एकरूपता, लैंगिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है। मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात में भाजपा का प्रयास इसी प्रतिबद्धता का हिस्सा है। इसके उलट, कांग्रेस का आधिकारिक रुख आमतौर पर इस पर सावधानी से देखने का रहा है। पार्टी अक्सर यह तर्क देती है कि भाजपा सरकार बेरोजगारी और महंगाई जैसे मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विषयों को आगे लाती है। कांग्रेस का कहना है कि किसी भी कानून को लाने से पहले व्यापक विमर्श और आम सहमति जरूरी है। वहीं, समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इसे अक्सर एक विवादास्पद मुद्दा माना है। सपा का कहना है कि वे बराबरी के पक्षधर हैं, लेकिन उनकी चिंता यह रहती है कि क्या यह कानून किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाने के लिए तो नहीं लाया जा रहा है। पार्टी विविधता के संरक्षण की बात पर जोर देती है। उधर, बसपा यूसीसी पर बहुत मुखर होने के बजाय सतर्क रुख अपनाये हुए है, और उसने आमतौर पर यह मांग की है कि किसी भी ऐसे कानून को लागू करने से पहले सभी वर्गों, खासकर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। कुल मिलाकर, भारत में यूसीसी का सफर एक जटिल सामाजिक और संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें एक ओर कानूनी एकरूपता का सपना है, तो दूसरी ओर भारत की विविध सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने की चुनौती भी मौजूद है।