सीतारमण की उद्योग जगत को सलाह, ‘मेड इन इंडिया’ से आगे बढ़ें
नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय उद्योग जगत से केवल कंपनियों का आकार बढ़ाने के बजाय गुणवत्ता, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान देने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि भारत के विकास का अगला चरण ज्यादा गुणवत्ता आधारित होना चाहिए और इसमें कॉरपोरेट क्षेत्र की भूमिका अहम रहेगी।
ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन (एआईएमए) के एक कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कंपनियों से अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) पर खर्च बढ़ाने की अपील की। उन्होंने कहा कि कंपनियां अपने स्तर पर शोध को बढ़ावा देने के साथ शैक्षणिक संस्थानों के साथ भी साझेदारी कर सकती हैं। इससे नए विचारों, बेहतर उत्पादों और भारत में बौद्धिक संपदा के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
सीतारमण ने कहा कि भारत की महत्वाकांक्षा केवल ‘मेड इन इंडिया’ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनका जोर ‘इमैजिन्ड इन इंडिया’ पर होना चाहिए, यानी उत्पादों का निर्माण ही नहीं बल्कि उनकी कल्पना, डिजाइन और तकनीकी विकास भी भारत में हो और इसके बाद उन्हें वैश्विक बाजारों तक पहुंचाया जाए।
आरएंडडी खर्च बढ़ाने पर जोर
वित्त मंत्री ने भारत में आरएंडडी पर होने वाले खर्च और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच अंतर का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, भारत का सकल आरएंडडी व्यय (जीईआरडी) जीडीपी का करीब 0.83 प्रतिशत है। इसके मुकाबले ओईसीडी देशों का औसत 2.7 प्रतिशत, चीन का 2.6 प्रतिशत और अमेरिका का 3.5 प्रतिशत बताया गया।
उन्होंने निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। सीतारमण के अनुसार, भारत के आरएंडडी खर्च में निजी क्षेत्र का योगदान करीब 36 प्रतिशत है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है।
उनका कहना था कि यदि भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना है तो कंपनियों की सफलता को केवल उनके आकार से नहीं मापा जाना चाहिए। प्रबंधन की सफलता इस बात से भी देखी जानी चाहिए कि देश में कितनी गुणवत्तापूर्ण कंपनियां और संस्थान तैयार हो रहे हैं।
स्टार्टअप्स के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण
वित्त मंत्री ने प्रबंधन शिक्षा को ज्यादा व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता भी बताई। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों के लिए छोटे और उपयोगी पाठ्यक्रम विकसित किए जा सकते हैं।
इन पाठ्यक्रमों में भर्ती प्रक्रिया, जिम्मेदारियों का बंटवारा, वित्तीय अनुशासन, ग्राहक प्रबंधन, अनुपालन और संगठनात्मक ढांचा तैयार करने जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं। इससे शुरुआती चरण की कंपनियों को कारोबार के साथ मजबूत प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है।
परिवार आधारित कारोबारों को लेकर भी उन्होंने विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जरूरत बताई। इनमें उत्तराधिकार योजना, कॉरपोरेट गवर्नेंस, पेशेवर प्रबंधन, विवाद समाधान और जिम्मेदारियों के स्पष्ट बंटवारे जैसे विषयों पर ध्यान देने की बात कही।
ग्रामीण भारत को भी बाजार का केंद्र बनाएं
सीतारमण ने उद्योग जगत से उत्पादों को केवल शहरी और उच्च आय वाले उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रखने को कहा। उन्होंने भारत की खपत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भूमिका को रेखांकित करते हुए कृषि, ग्रामीण निर्माण, परिवहन और असंगठित क्षेत्र से जुड़े परिवारों को भी कारोबारी रणनीति में शामिल करने की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि यदि कॉरपोरेट क्षेत्र केवल शहरी प्रीमियम उपभोक्ताओं पर ध्यान केंद्रित करता है, तो आर्थिक विकास की व्यापक और संरचनात्मक मजबूती प्रभावित हो सकती है। ऐसे में कंपनियों के लिए भारत के अलग-अलग आय वर्ग और क्षेत्रों की जरूरतों को समझना महत्वपूर्ण होगा।
कॉरपोरेट गवर्नेंस और संवाद पर जोर
वित्त मंत्री ने कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर भी उद्योग जगत को संदेश दिया। उन्होंने कंपनियों से सरकार और नियामकों के साथ रचनात्मक संवाद बनाए रखने की अपील की।
उन्होंने कहा कि हर मतभेद को तुरंत कानूनी विवाद में बदलने के बजाय बातचीत और परामर्श के जरिए समाधान तलाशने की कोशिश होनी चाहिए। उनके अनुसार, व्यवसायों में पारदर्शिता, पूर्वानुमान और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना जरूरी है।
सीतारमण ने कहा कि एक परिपक्व अर्थव्यवस्था में असहमति का मतलब टकराव नहीं होना चाहिए। उद्योग, सरकार और नियामकों के बीच संवाद की बेहतर व्यवस्था से कारोबारी माहौल को अधिक स्थिर और भरोसेमंद बनाने में मदद मिल सकती है।