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जीवित माता पिता की सेवा ही है सच्चा श्राद्ध

जीवित माता पिता की सेवा ही है सच्चा श्राद्ध

बाल मुकुन्द ओझा
श्राद्ध के दिन चल रहे हैं। श्राद्ध को लेकर बड़ी बड़ी बातें की जा रही है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि माता-पिता वृद्धावस्था में अभाव या असंतोष की स्थिति में रह जाएं तो संतान पितृ ऋण से मुक्त नहीं हो सकता। इसलिए कहा गया है, श्राद्ध का सच्चा अर्थ है जीवित पितरों की सेवा और उनका सम्मान। आजकल देखा गया है हम जीवित माता पिता को अभावों में छोड़ देते है और उनकी मृत्यु के उपरांत श्राद्ध कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते है। भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक विशिष्ट अवसर श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष कहलाता है। हिंदू परंपरा के अनुसार श्राद्ध पक्ष को दिवंगत आत्माओं से आशीष लेने का महापर्व के रूप में भी माना गया है। श्रद्धा से श्राद्ध बना है। श्रद्धापूर्वक किए गए कार्य को ही श्राद्ध कहते है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है। जीवित बुजुर्गों और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु पितरों के लिए श्रद्धा एवं कृतज्ञता प्रकट करने वाले को कोई निमित्त बनाना पड़ता है। यह निमित्त है श्राद्ध। इस साल पितृ पक्ष 26 सितंबर 2026 से शुरू हो गया और समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
पंचांग के मुताबिक पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक माना जाता है जब वह अपने जीवन-काल में जीवित माता-पिता की सेवा करे और मरणोपरांत उनकी मृत्यु तिथि (बरसी) और पितृपक्ष में उनका विधिवत श्राद्ध करे। शास्त्रों में उल्लेख है कि मृत्यु पश्चात मनुष्य चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता है। मृत्यु के पश्चात आत्मा की तीन स्थितियां बताई गई हैं। पहला, अधोगति यानी भूत-प्रेत-पिशाच आदि योनि में जन्म लेना। दूसरा, स्वर्ग प्राप्ति और तीसरा मोक्ष। गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि इसके अलावा भी जीव को एक ऐसी गति मिलती है, जिसमें उसे भटकना पड़ता है। इसे प्रतीक्षा काल कहा जाता है। इन्हीं भटकी हुई आत्माओं की मुक्ति के लिए पितरों का तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा जब देह छोड़ती है तो जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति की स्थिति के अनुसार तीन दिन के भीतर वह पितृलोक चली जाती है।
आज की युवा पीढ़ी श्राद्ध के बारे में कुछ नहीं जानती। हिन्दू धर्म में सैंकड़ों पर्व, त्योंहार, व्रत और दिन आते है जब हम श्रद्धा के साथ इन्हें मनाते है। इन्हीं में एक श्राद्ध पक्ष है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि इस समय पितृ धरतीलोक पर आते हैं और किसी न किसी रूप में अपने परिजनों के आसपास रहते हैं। मान्यता के अनुसार जो परिजन अपना देह त्यागकर चले गए हैं, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए सच्ची श्रद्धा के साथ जो तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है।श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि उनके पुत्र-पौत्रादि उन्हें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। ऐसे व्यक्ति जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है उन्हें पितर कहते हैं। मृतक विवाहित या अविवाहित, बच्चा या बुजुर्ग, स्त्री या पुरुष को पितर कहा जाता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए भाद्रपद महीने के पितृपक्ष में उनको तर्पण दिया जाता है। पितर पक्ष समाप्त होते ही परिजनों को आशीर्वाद देते हुए पितरगण वापस मृत्युलोक चले जाते हैं। इसलिए इस समय श्राद्ध करने का विधान है।
पितरों की प्रसन्नता और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सोलह दिनी पर्व श्राद्ध पक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक मनाया जाता है। इसे पितृपक्ष, महालय के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने का समय है. श्राद्ध पक्ष में तर्पण, पिंडदान करने से न सिर्फ पितरों को तृप्ति मिलती है बल्कि पूर्वजों का ऋण भी चुकता हो जाता है।

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