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चुनाव आयोग विवाद : उपलब्धियों के बीच उठते भरोसे के सवाल

चुनाव आयोग विवाद : उपलब्धियों के बीच उठते भरोसे के सवाल

-जयदेव राठी
भारत के चुनाव आयोग और उसके मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इन दिनों राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। विपक्ष उनके खिलाफ इस्तीफे की मांग कर रहा है, जबकि सत्ता पक्ष उन्हें एक निष्पक्ष, नियमसम्मत और दक्ष चुनाव प्रबंधनकर्ता के रूप में पेश कर रहा है। इस टकराव के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप है, या फिर सचमुच लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खड़ा हो चुका है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में कई चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हुए हैं। यह अपने-आप में कम उपलब्धि नहीं है। भारत जैसे विशाल, विविधता से भरे और राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील देश में चुनाव कराना केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुरक्षा, प्रशासन, कानून-व्यवस्था और तकनीकी प्रबंधन की बड़ी परीक्षा होती है। कई स्थानों पर, जहां पहले हिंसा, तनाव, धांधली और टकराव की खबरें आती थीं, वहां अब अपेक्षाकृत शांत मतदान होना आयोग की दक्षता का संकेत माना जा सकता है। पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव कराना निश्चित रूप से प्रशासनिक सफलता के रूप में देखा जाएगा।
लेकिन लोकतंत्र में केवल शांतिपूर्ण मतदान ही पर्याप्त नहीं होता। चुनाव की साख इस बात पर भी टिकती है कि मतदाता सूची कितनी सही है, प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, और आयोग कितना स्वतंत्र दिखाई देता है। विपक्ष का पूरा हमला इन्हीं बिंदुओं पर केंद्रित है। उसका कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर मतदाता सूची में हेरफेर की आशंका है और इससे “वोट चोरी” का रास्ता खुल सकता है। विपक्ष यह भी आरोप लगा रहा है कि आयोग कुछ मामलों में सत्ता के दबाव में काम कर रहा है और पूरी तरह निष्पक्ष संस्था के रूप में नहीं दिख रहा।
यह आरोप जितने सीधे हैं, उतने ही गंभीर भी हैं। चुनाव आयोग किसी भी लोकतंत्र में केवल मतदान कराने वाली मशीन नहीं, बल्कि निष्पक्षता का प्रतीक होता है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि मतदाता सूची में जानबूझकर बदलाव किए जा रहे हैं, या कुछ समूहों के वोट कमजोर किए जा रहे हैं, तो चुनाव परिणामों की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। यही कारण है कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग को केवल एक प्रशासनिक असहमति नहीं, बल्कि संस्थागत संकट के रूप में पेश कर रहा है।
सत्ता पक्ष की दलील भी पूरी तरह हल्की नहीं कही जा सकती। भाजपा का कहना है कि आयोग कानून के अनुसार काम कर रहा है और उस पर लगाए जा रहे आरोप राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं। यह भी एक तथ्य है कि 2014 से केंद्र में भाजपा की सरकार है, जबकि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति 2025 में हुई। इसलिए उन्हें उन सभी राजनीतिक परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार ठहराना, जो उनसे पहले की हैं, तर्कसंगत नहीं होगा। सरकार यह भी कह रही है कि आयोग के कामकाज पर सवाल उठाना विपक्ष की रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अपनी हारों की जिम्मेदारी दूसरों पर डालना है।
लेकिन दूसरी ओर, यह दलील भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती कि विपक्ष केवल हार न पचा पाने की वजह से शोर मचा रहा है। भारतीय राजनीति में चुनावी हार के बाद आरोप लगाना नया नहीं है, पर हर बार उन आरोपों को झूठा कहकर नकार देना भी उचित नहीं। यदि विपक्ष किसी तकनीकी प्रक्रिया, जैसे एसआईआर को लेकर सवाल उठा रहा है, तो आयोग की जिम्मेदारी है कि वह इन संदेहों को विस्तार से, स्पष्ट रूप से और सार्वजनिक रूप से दूर करे। लोकतंत्र में “हमने सही किया” कहना पर्याप्त नहीं होता; “हमने सही क्यों किया” यह दिखाना भी जरूरी है।
इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू है आयोग के भीतर कथित असहमति। खबरों के अनुसार, कुछ चुनाव आयुक्तों ने कुछ निर्णयों पर आपत्ति जताई। यदि यह तथ्य सही है, तो यह आयोग की सामूहिक कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। चुनाव आयोग जैसी संस्था के लिए यह बेहद जरूरी है कि उसके निर्णय सर्वसम्मति, पारदर्शिता और रिकॉर्डेड प्रक्रिया के आधार पर लिए जाएं। यदि अंदरूनी मतभेद सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनते हैं, तो संस्था की विश्वसनीयता और अधिक प्रभावित होती है। यही वह बिंदु है जहां विपक्ष को राजनीतिक हथियार मिल जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत की वोटर-आईडी व्यवस्था की तारीफ भी इस बहस का हिस्सा बनी है। सत्ता पक्ष इसे भारतीय चुनाव प्रणाली की वैश्विक स्वीकार्यता के प्रमाण के रूप में पेश कर रहा है। निस्संदेह, किसी विश्व नेता द्वारा भारत की चुनावी व्यवस्था की प्रशंसा एक सकारात्मक बात है। यह भारत की प्रशासनिक क्षमता और मतदाता पहचान व्यवस्था की मजबूती को रेखांकित करता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा और घरेलू विवाद एक ही समय में मौजूद रह सकते हैं। एक देश की बाहरी छवि मजबूत हो, फिर भी उसकी संस्थाओं के भीतर पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए ट्रंप की तारीफ को विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं माना जा सकता।
अब प्रश्न यह है कि क्या विपक्ष वास्तव में लोकतांत्रिक चिंता से प्रेरित है या यह केवल राजनीतिक असंतोष का विस्तार है। इसका उत्तर एकतरफा नहीं दिया जा सकता। विपक्ष स्वाभाविक रूप से उन संस्थाओं पर सवाल उठाता है, जिनकी निष्पक्षता पर उसे संदेह हो। दूसरी ओर, सत्ता विरोधी राजनीति में संस्थाओं को घेरना भी एक रणनीति होती है। इसलिए यह मान लेना कि हर आरोप सिर्फ बदले की भावना है, गलत होगा; और यह मान लेना कि हर आरोप पूरी तरह सत्य है, यह भी जल्दबाजी होगी। सही निष्कर्ष यही है कि विवाद में राजनीतिक लाभ-हानि भी है और लोकतांत्रिक चिंता भी।
भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती यही रही है कि यहां संस्थाओं पर बहस होती है। लेकिन चिंता तब बढ़ती है जब यह बहस विश्वास के संकट में बदलने लगे। चुनाव आयोग पर भरोसा टूटना किसी एक सरकार या एक पार्टी का संकट नहीं होता; यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का संकट होता है। इसलिए आयोग को केवल कानूनी बचाव नहीं, बल्कि नैतिक पारदर्शिता भी दिखानी होगी। उसे यह बताना होगा कि मतदाता सूची की प्रक्रिया कितनी खुली थी, किन मानकों पर एसआईआर किया गया, किस स्तर पर निगरानी हुई और शिकायतों का निपटारा कैसे किया गया।
विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि उसके पास ठोस तथ्य हैं, तो उन्हें प्रमाण के साथ सामने लाना चाहिए। केवल “वोट चोरी” जैसे बड़े और प्रभावशाली शब्दों से जनता के मन में संदेह पैदा किया जा सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक बहस को मजबूती नहीं दी जा सकती। राजनीतिक दलों को यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र में आलोचना और अराजकता के बीच एक महीन रेखा होती है। उस रेखा को पार करने से लोकतांत्रिक लाभ नहीं, बल्कि अविश्वास बढ़ता है।
अंततः यह विवाद ज्ञानेश कुमार के एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारतीय चुनाव व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। उनके कार्यकाल की उपलब्धियां, खासकर शांतिपूर्ण चुनाव, निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उपलब्धियां तभी स्थायी मानी जाएंगी जब उनके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक भरोसा भी जुड़ा हो। इसी तरह विपक्ष के आरोप तभी प्रभावी होंगे जब वे भावना नहीं, साक्ष्य पर आधारित हों। लोकतंत्र की मजबूती इसी संतुलन में है। न आयोग को अपनी सफलता के कारण सवालों से बचना चाहिए, और न विपक्ष को हर हार को संस्थागत साजिश में बदल देना चाहिए।
भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की परीक्षा होते हैं। इसलिए इस बहस का समाधान न तो नारेबाजी में है, न बचाव की भाषा में। समाधान है खुलापन, जवाबदेही और संस्थागत शुचिता। यही चुनाव आयोग की असली परीक्षा है, और यही भारतीय लोकतंत्र की भी।

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