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एंटीबायोटिक ने बिगाड़ा देश का स्वास्थ्य

एंटीबायोटिक ने बिगाड़ा देश का स्वास्थ्य

देशभर में एक बार फिर एंटीबायोटिक दवाओं की चर्चा परिचर्चा हो रही है। घर घर हो रही इस चर्चा का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। मोदी ने इस वर्ष की मन की बात की रेडियो कार्यक्रम की अंतिम कड़ी में एंटीबायोटिक दवा के बेअसर होने पर चिंता जताते हुए देशवासियों से कहा कि वे डॉक्टर की सलाह के बिना इसका प्रयोग नहीं करे। मोदी ने कहा लोग यह मानते है कि एंटीबायोटिक की एक गोली से उनकी तकलीफ दूर हो जाएगी। बिना चिकित्सकीय सलाह के मनमर्जी से लेने की वजह है ये दवाइयां बेअसर साबित हो रही है।
प्रधानमंत्री के इस खुलासे से देश सकते में है। आजकल एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ रहा है। रोजाना की दौड़ती-भागती जिंदगी में लोग सरदर्द, पेटदर्द, सर्दी, खांसी या बुखार होने पर एंटीबायोटिक दवा ले लेते हैं। बहुत से लोग बिना किसी डॉक्टर की सलाह के भी इनका इस्तेमाल करने लगे हैं। यह सेहत के लिए नुकसानदायक है। एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग किस प्रकार हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुंचता है इसकी एक भयावह जानकारी हमारे सामने आयी है। एक रिसर्च में बताया गया है कि सबसे ज्यादा एजिथ्रोमाइसिन दवा का उपयोग किया गया। ये 500 एमजी की एक टैबलेट होती है, जो एंटीबायोटिक का काम करती है। हमारे देश में करीब 8 प्रतिशत लोगों ने इस दवा का सेवन किया था। एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में एंटीबायोटिक का सेवन हर दशक में 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। वहीं एक वैश्विक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है, बिना चिकित्सक की सलाह से लोग अपनी मन मर्जी से एंटीबायोटिक दवाएं ले रहे हैं, जिसके कारण एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस तेजी के साथ बढ़ने के साथ सेहत को खतरा उत्पन्न हो रहा है। इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे है। शोध में खुलासा किया गया है कि दुनिया भर में एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस से 30 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। शोध में बताया गया कि दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका में 2019 और 2021 के बीच एंटीबायोटिक दवाओं की खपत बहुत तेजी से बढ़ी है। इस अवधि में दक्षिण पूर्व एशिया में 160 प्रतिशत और अफ्रीका में 126 प्रतिशत तक बढ़ा है।
असल में एंटीबायोटिक दवाइयां हमारे देश में लगभग हर मेडिकल स्टोर पर बिकने वाली आम दवाओं में से एक हैं। हालाँकि यह दवा डॉक्टरी पर्चे पर दी जानी चाहिए मगर देखा गया है दुकानदार इसे बिना समुचित पर्ची के लोगों को दे देते है। हमारे देश में लोग मामूली बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास नहीं जाते। वे केमिस्ट से दवाई ले लेते हैं। कुछ लोग कई दवाओं के बारे में जानते हैं कि ये किस बीमारी को ठीक करती है और उसी हिसाब से दवाई ले लेते हैं। लेकिन उन्हें इन दवाइयों के साइड इफेक्ट के बारे में पता नहीं होता। बिना डॉक्टर की सलाह के ये दवाइयां जरूरत से ज्यादा लेने के बाद ये शरीर में रेसिस्टेंस यानी प्रतिरोध पैदा कर लेती हैं। इसके बाद इनका कोई असर नहीं होता।
इससे पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल पर चेतावनी जारी की थी। एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिसर्च के मुताबिक एंटीबायोटिक के ज्यादा इस्तेमाल से 'एंटी माइक्रो-बियल रेजिस्टेंस' का रिस्क बढ़ रहा है। जो वाकई में किसी महामारी से भी बड़ा खतरा है। एंटी माइक्रो-बियल रेजिस्टेंस' से दुनिया में हर साल 50 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यही हाल रहा तो साल 2050 तक मौत का आंकड़ा करोड़ों के पार चला जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के हाल के एक अध्ययन में पता चला है कि कोविड महामारी के दौरान लोगों को इतनी ज्यादा एंटीबायोटिक दवाएं खिलाई गईं कि उससे एंटीमाइक्रोबियल और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और ज्यादा बढ़ गया है। संगठन के मुताबिक महामारी के दौरान जितने लोगों को कोविड हुआ, उनमें से महज 8 प्रतिशत लोगों को एंटीबायोटिक दवाओं की जरूरत थी, लेकिन डर का माहौल इतना था कि सारे लोगों को बहुत ज्यादा मात्रा में यह दवाएं दी गईं। तकरीबन 75 प्रतिशत लोगों ने पैंडेमिक के दौरान एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन किया। भारत में कोविड के दौरान लोग सिर्फ डॉक्टरी सलाह पर ही नहीं, बल्कि थोड़ी भी सर्दी-खांसी होने पर खुद ही मेडिकल स्टोर से खरीदकर एंटीबायोटिक दवाइयां खा रहे थे। इन सबका नतीजा ये हुआ है कि सुपरबग में दवाइयों के प्रति एक रेजिस्टेंस डेवलप हो गया है। यह समस्या कोविड के पहले भी गंभीर थी, लेकिन अब और ज्यादा हो गई है।


-बाल मुकुन्द ओझा

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