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झांसी में विराजते हैं विघ्नहर्ता, जानें इस प्राचीन गणेश मंदिर की खासियत

झांसी में विराजते हैं विघ्नहर्ता, जानें इस प्राचीन गणेश मंदिर की खासियत

झांसी। झांसी के ऐतिहासिक शहर में जहां हर दीवार और हर पत्थर पर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी की कहानियां गूंजती हैं, वहां ठीक झांसी किले के प्रवेश द्वार पर स्थित है विघ्नहर्ता भगवान गणेश का एक अद्भुत प्राचीन मंदिर। यह मंदिर न सिर्फ अपनी अनोखी वास्तुकला और भक्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी उस ऐतिहासिक गाथा के लिए भी जाना जाता है। यह प्राचीन गणेश मंदिर न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है बल्कि झांसी की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी अहम हिस्सा है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर विघ्न विनाशक भगवान गणेश से आशीर्वाद लेते हैं। श्री गणेश के इस प्राचीन मंदिर में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई रोजाना दर्शन-पूजन करती थीं। मंदिर की बनावट में एक खास गुंबद जैसा ढांचा है, जो प्राचीन वास्तुकला की शानदार कारीगरी का नमूना है। मंदिर के अंदर भगवान गणेश की संगमरमर की सुंदर मूर्ति स्थापित है, जिसका दिव्य चेहरा दमकता है।
1842 में राजा गंगाधर राव और मणिकर्णिका तांबे (जिन्हें बाद में रानी लक्ष्मीबाई नाम दिया गया) का विवाह इसी मंदिर में हुआ था। पवित्र रीतियों और अनुष्ठानों के बीच मणिकर्णिका को 'रानी लक्ष्मीबाई' का नाम मिला। किंवदंती है कि रानी लक्ष्मीबाई नियमित रूप से इस मंदिर में आकर भगवान गणेश की पूजा करती थीं और उनसे शक्ति व मन की शांति प्राप्त करती थीं।
मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहास में थोड़ा रहस्य बना हुआ है। माना जाता है कि यह मंदिर 1760 ईस्वी के आसपास बनाया गया था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मराठा पेशवाओं के अधीन झांसी के सूबेदार विश्वास राव लक्ष्मण ने इसका निर्माण करवाया, जबकि कुछ अन्य का कहना है कि रघुनाथ राव नेवलकर, जो नेवलकर राजवंश के संस्थापक थे, उन्होंने इसकी नींव रखी। हालांकि, एक बात निश्चित है कि यह मंदिर आज भी पुरानी पीढ़ियों की अटूट आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है।
गणेश मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां गणेश चतुर्थी का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। स्थानीय लोग आज भी अपने घर में गणेश प्रतिमा लाने से पहले इस मंदिर में पूजा करते हैं। रानी लक्ष्मीबाई के समय से भी पहले से यह परंपरा चली आ रही है।

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