बाल अपराध के पीछे गरीबी और अशिक्षा सबसे बड़ा कारण
बाल मुकुन्द ओझा
देश की सर्वोच्च अदालत का कहना है, जिस माहौल में बच्चे को शिक्षा और बराबरी का अवसर नहीं मिलता, वहां उसके सामने गलत रास्ते खुल सकते हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा है कि गरीबी, असमानता, अशिक्षा और भेदभाव वाले माहौल में बड़ा होने वाला बच्चा अपराध की दुनिया की तरफ खिंच सकता है। अदालत ने यह बात एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान कही, जिसमें एक नाबालिग पर दहेज हत्या के सबूत मिटाने की कोशिश का आरोप था। अदालत ने साफ किया कि किसी बच्चे को सिर्फ उसके अपराध के आधार पर हमेशा के लिए अपराधी की पहचान नहीं दे देनी चाहिए। कई बार बच्चे के पीछे उसके परिवार, आर्थिक स्थिति, पढ़ाई, आसपास का माहौल और मानसिक स्थिति जैसी परिस्थितियां भी काम कर रही होती हैं।
बाल- अपराधों की बढती संख्या देश के भविष्य के लिए खतरे का संकेत हैं। जब किसी व्यक्ति द्वारा मान्य नियमों का पालन नही किया जाता तब अपराध की समस्या पैदा होती है, फिर चाहे वह अपराध हो या बाल-अपराध। बाल अपराधी का तात्पर्य उस बच्चे से है जो आदत के रूप मे अपनी निराशाओं को समाज विरोधी कार्यों अथवा हिंसा के रूप मे प्रदर्शित करता है। पिछले कुछ वर्षों में टीन एजर्स में अपराधिक प्रवृति में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है जो चिंता का विषय है। भारत में साल 2024 में किशोर अपराध के 34,878 मामले दर्ज हुए है। इनमें 16-18 के किशोरों की हिस्सेदारी अपराध के मामले में सबसे ज्यादा 77.7 प्रतिशत रही है। हाल के वर्षों में आपराधिक वारदातों में टीन एजर्स के लिप्त होने का ट्रेंड बढ़ रहा है। देश के कानून में नाबालिगों के लिए थोड़ी नरमी बरती गई है। बच्चों और नाबालिगों के लिए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत मामूली या कम सजाएं होती हैं। इसका फायदा उठाकर अपराधी भी बड़ी संख्या में बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2026 की एक अध्ययन समीक्षा बताती है कि बच्चों के कानून से टकराने के पीछे सामाजिक- आर्थिक स्थिति, परिवार में अस्थिरता, मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत कमियां जैसे कई अलग-अलग वजहें जुड़े हो सकती हैं। इसमें ये भी कहा गया है कि भारत में किशोर न्याय व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि बच्चे को सुधारना और समाज में वापस लाना है।
देश के कुछ राज्यों में अपराधियों द्वारा उगाही, हत्या, अपहरण व अन्य अपराधों के लिए बच्चों का इस्तेमाल हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि आपराधिक वारदात में लिप्त ज्यादातर नाबालिग प्राइमरी तक ही पढ़े होते हैं। दुनियाभर में बाल अपराधों की बढ़ती संख्या से लोग चिंतित हैं।
मारपीट और अपमान बहुधा बालक को अपराध की राह पर ले जाता है। घर में वातावरण प्रेमपूर्ण होना चाहिए दूसरे बालक की जिज्ञासाओं के समाधान में बडी सावधानी की आवश्यकता है कोई बात पूछने पर बालक को झिझक दिया जाए या उससे झूठ बोल देने पर प्रभाव बडा बुरा पडता है। बहुधा बालको से यौन जिज्ञासाओं के विषय में झूठ बोल दिया जाता है बालक जब अपने साथियों या घर के नौकरों से सही बात का पा जाता है तब उन पर माता-पिता का झूठ खुला जाता है। बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों की सबसे मुख्य वजह मौजूदा दौर में एकल परिवार है। माता-पिता बच्चों का ध्यान पूरी तरह से नहीं रख पाते, ऐसे में मासूम अपराध का शिकार हो जाते हैं। साथ ही कम उम्र होने के चलते बच्चे अपने साथ होने वाले अपराधों को बता नहीं पाते, जिसका समाज में घूम रहे अपराधी किस्म के लोग फायदा उठाते हैं।
कई शोध रिपोर्टों के मुताबिक बहुत से मामले ऐसे भी हैं जहाँ बच्चे घरेलू तनाव के कारण अपराध कर देते है। इनमें एक कारण गरीबी और अशिक्षा भी है। बाल अपराधियों की संख्या गावों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। जहाँ तक इनके दण्ड की बात है तो कोर्ट यह मानता है कि इस उम्र के बच्चे अगर जल्दी बिगड़ते हैं और उन्हें अगर सुधारने का प्रयत्न किया जाए तो वह सुधर भी जल्दी जाते हैं, इसीलिए उन्हें किशोर न्याय सुरक्षा और देखभाल अधिनियम 2000 के तहत सजा दी जाती है। भारत में बाल न्याय अधिनियम 1986 (संशोधित 2000) के अनुसर 16 वर्ष तक की आयु के लड़कों एवं 18 वर्ष तक की आयु की लड़कियों के अपराध करने पर बाल अपराधी की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।
हमारे देश में बाल अपराधियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है .बाल अपराधों की बढती संख्या भविष्य के लिए खतरे का संकेत हैं। बच्चे भविष्य की धरोहर है, लेकिन सामाजिक कमजोरियों और सरकार के दलमल रवैये के चलते हमारी यह धरोहर लगातार पतन के रास्ते आगे बढ़ती जा रही हैं बाल अपराधों की ब़ढती संख्या हमारे समाज के माथे एक ऐसा कलंक है जिससे तत्काल निजात पाने की जरुरत है। जो बच्चे अपराधी बन गये उनमें सुधार कर उन्हें अच्छा नागरिक बनाया जाये, यह भी अत्यंत आवश्यक है।