बदहाल श्रम शक्ति
भारत वर्तमान में विकास की धीमी गति, निम्न निवेशचक एवं विपरीत आर्थिक परिस्थितियों से जूंझ रहा है। आर्थिक उदारीकरण, लिबरल पूंजीवाद, स्वतंत्र अर्थव्यवस्था, तथा रोजगार विहीन विकास के कारण निराशावाद व असंतोष बढ़ रहा है। भारत की युवा कार्य शक्ति के लिए रोजगार का सृजन बड़ी समस्या हो गई है। कोरोना महामारी की रोकथाम हेतु लगे लाकडडाउन के कारण गत वर्ष करीब 12 करोड 20 लाख लोग बेरोजगार हो गये, रोजगार चला गया। पचहत्तर फीसदी लोग असंगठित क्षेत्रों क,े चैरासी फीसदी घरों की आमदनी घटी। निम्न आय वाले तबके के लोगों के 64 प्रतिशत गरीबों को कर्ज लेना पड़ा।
निम्न कौशल वाले लाखों लोगों का रोजगार चला गया। आईटी उधोग व निर्माण कम्पनियों में लाखों लोगों की नौकरियां कम कर दी गई। मध्यमवर्गीय शहरी नौकरीयों पर संकट के बादल छा गये। बैंक, उपभोक्ता वस्तुओं की कम्पनियां, आॅटोंमोबाईल कम्पनियां, सेवा क्षेत्रों में नौकरीया कम कर दी गई। निर्माता मजदूर व देहड़ी मजदूर आज सड़क पर रेंग रहा है।
’एवान हेविट‘ के अनुसार उर्जा, कंस्ट्रक्शन उपभोक्ता वस्तुओं आदि से जुड़ी 114 लिस्टेड कम्पनियों में 60 लाख कर्मचारीयों की संख्या कम हो गई है। मध्यमवर्ग के आधे पेशेवर अप्रांसगिक हो जायेगें। विस्केट श्रम बाजार के सुधारो के कारण विदेशियों में मिलने वाले रोजगार में कमी आई है। असली संकट छोटे एवं मध्यम उपक्रमों को लेकर है। एमएमएमई सेक्टर रोजगार के लिए महत्वपूर्ण है। उनका देश के सकल उत्पाद में 37.5 फिसदी हिस्सा है, आठ करोड़ लोगों की जीविका इसी क्षेत्र से चलती है।
24 मार्च, 2020 को लाॅकडाउन के पश्चात सेंटर फार मानिटंरिग इन्डियन इकानामी ने लेबर फोर्स सर्वे के हवाले से बताया कि गत वर्ष शहरी बेरोजगारी दर 24 मार्च के बाद 22 मई तक 8.66 फीसदी से बढ़कर 30.39 फीसदी हो गई। भारतीय श्रम शक्ति की भागीरदारी दर में तीखी गिरावट आई है और यह महज 36.1 फीसदी आई है। बेरोजगारी 22 फीसदी बढ़ गई हैं। भारत में अनौपचारीक अर्थव्यवस्था में मजदूरों की अब हिस्सेदारी करीब 83 फीसदी है। इसमें 40 करोड़ श्रमिक के सामने गरीबी में फसने का संकट है। रिपोर्ट के मुताबिक 11.76 करोड़ लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो बैठे है। करोड़ों दिहाड़ी मजदूर, घरेलू कामगार, रेहड़ी पटरी विक्रेता, आॅटोरिक्शा, टैक्सी चालक, कचरा बीनने वाले, निर्माता मजदूर और असहाय प्रवासी कामगारों की उम्मीद की किरण छिन्न भिन्न हो गई है। आज हम इन परिस्थितियों की जिम्मेदारी कोरोना वायरस पर डाल रहे है परन्तु बगैर बेहतर प्लानिंग, प्रबन्धन व तैयारी के कारण कमजोर तड़का सड़क पर भूखा घूम रहा हैं।
सबसे बड़ी मार एमएसआई पर पड़ी जो सबसे बड़ी ज्यादा रोजगार देने वाला सेक्टर है। मजदूरों के लिए महंगाई का मामला भी अत्यन्त गंभीर है। सरकारी संपत्तियों में हिस्सेदारी, बेचना, आत्मनिर्भर भारत की सोच के खिलाफ है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को अलविदा करना है। पब्लिक सेक्टर यूनिट के कर्मियों को हतोत्साहित किया जा रहा है। मोदी सरकार ने प्राईवेटाईजेशन पर भरोसा किया है। 2017-2018 में देश की श्रम शक्ति का 3 करोड अथवा 6.1 प्रतिशत बेरोजगार थी। 2019 में इस संख्या में 4 से 5 करोड़ की वृद्धि हुई।
राष्ट्र निर्माण के इन वुरोधाओं का जीवन संकट में है। बंद उद्योग-धन्धों को चलाने के लिए अब लेबर कानूनों में बडे़ बदलावों की घोषणा आन्ध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, गुजरात ने करदी है। तीनों राज्यों ने तीन वर्ष के लिए उद्योगों को तीन वर्ष के लिए छूट दी है। बल्कि उनके रजिस्ट्रेशन और लाईसेंस की प्रक्रिया को आॅनलाइन कर दिया। लेबर कानून की विभिन्न धाराओं के तहत पंजीकरण व लाईसेंस कराने, शिफ्टों के परिवर्तन कराने, काम के घन्टें 12 घन्टे तक बढ़ाने, यूनियनों को मान्यता देने जैसी छूट दी गई है। सरकारों का तर्क है उद्योगों को राहत मिलेगी रोजगार के नए दरवाजे खुलेगें। अनेक श्रम कानूनों को चार करोड के भीतर समेट कर उन्हें इस तरह बदल दिया गया है कि मालिकों को मजदूरों व कर्मचारियों के शोषण की ओर ज्यादा आजादी हासिल हो जाये।
उत्तरप्रदेश में आर्डीनेन्स प्रसारित कर सैन्ट्रल लेबर कानूनों को सस्पेण्ड कर दिया गया है। राज्य में केवल बिल्डिगं एण्ड अदर कन्सट्रक्शन वर्कर्स एक्ट, पेमेन्ट आॅफ वेजैन एक्ट की धारा 5, वर्कमैन कम्पन सेशन एक्ट के प्रावधानों को छोड़कर सभी कानून अगले 1000 दिन के लिए अप्रभावी कर दिये है। सरकार द्वारा बड़े औद्योगिक घरानों के दबाव में मजदूरों के हितकारी कानून, इन्डस्ट्रीयल डिस्फ्यूट एक्ट, फैक्ट्रीज एक्ट, कानटैक्ट लेबर एक्ट आदि में संशोधन किये जा चुके है। जनता द्वारा चुनी गई सरकार देशी विदेशी महाकाय कम्पनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए अपने मजदूरों की मेहनत को, उनकी आजीविका को और उनके जीवन को गिरवी रख रही है।
पूर्व में किसी भी उद्योग को जिसमें 100 से अधिक मजदूर कार्यरत थे उसको बगैर सरकार की इजाजत बंद नहीं किया जा सकता था अथवा छटनी व कमी नहीं की जा सकती थी, अब इस संख्या को बढ़ाकर 300 कर दिया गया है। फलस्वरूप अब 95 प्रतिशत औद्योगिक घराने बगैर राज्य सरकार के अनुमोदन बंद किया जा सकते है अथवा उनमें छटनी की जा सकती है। बहाना नुकसान को कम करने की होगा, फैक्ट्री एक्ट में 10 वर्कर्स पर सेफ्टी आवश्कतायें अब प्रावधान 20 से अधिक संख्या पर कर दिया गया। काॅन्टेक्ट लेबर एक्ट में 20 वर्कर्स पर बंद करने अथवा छटनी करने की स्वतंत्रता लेबर से सम्बन्धित कानून/प्रावधान लागू होते थे जा अब 50 से ऊपर वर्कर्स होने पर लागू होंगे। 300 वर्कर्स की यूनिट दी जा चुकी हैं।
यह सब उद्योगपतियों व व्यवसायिकों के हित्तों को ध्यान में रखकर किया गया। आर्थिक उदारीकरण में गरीबी निवारण को भुलाया जा रहा हैं मजदूरों के हितों व अधिकारों को कम किये जा रहे है। सरकार केवल उद्योग हितों को ध्यान में रखकर छूट दी है, कृषि को बेलआउट पैकेज नहीं दिया हैं। भूमिहीन कृषक मजदूर गरीबी बीमारी, कंगाली में पिस रहे है।
बन्धुआ मजदूरी की रोकथाम हेतु 1975 में कानून बना परन्तु उसकी पूणतः पालन नहीं कराया गया। आज भी बन्धुआ मजदूरों से दिन-रात काम कराया जा रहा है। खेतीहर मजदूरों की आय व मजदूरी में वृद्धि की योजनायों के बजट प्रावधान कम कर दिया गया। 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराने की अनुमति नहीं है। भारत की कुल जनसंख्या का 42 प्रतिशत 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों का है। सरकार ने भोजनालयों ढ़ाबा घरों व फैक्ट्रीयों में बाल श्रम प्रतिबान्धित किया है। भोजन सबकों चाहिए, परिवार में जीविकोपार्जन करने वाले व्यक्ति के पास रोजगार नहीं है। इसलिए खुले आम बाल मजदूरी चल रही है।
सरकारों का असंगठित क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी व काम की दशाओं में सुधार पर कोई ध्यान नहीं है। ग्रामीण मजदूरों के मामले में हमारी स्थिति खराब है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का कोई धणी धोरी नहीं है। असंख्य उदाहरण है जिसमें असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, बालक बालिकाओं, महिला श्रमिकों को शोषण पाया जा रहा है। ऐसे में मजदूर विरोधी प्रावधान, अमीरी व गरीबी के बीच लगातार बढ़ती खाइर्, अनेक जटिल समस्याओं अपराध व संधर्ष को जन्म दे सकती है। सभी बड़े श्रमिक संगठनों ने मांग की है श्रमिकों के कल्पना की शर्तों को उधमियों के हित में और कमजोर नहीं करें, परन्तु गरीब व गरीबी को मात्र ऐसा विषय बनाया जा रहा है, जिसकी चर्चा जारी रहे। मजदूर मजबूर बना रहे।
-डाॅ. सत्यनारायण सिंह