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लोकतंत्र के मंदिर में सियासी बवंडर

लोकतंत्र के मंदिर में सियासी बवंडर

बाल मुकुन्द ओझा
संसद का बजट सत्र भारत के लोकतंत्र के लिए काफी शर्मनाक साबित हो रहा है। लोकतंत्र के इस पावन पवित्र मंदिर में जनता के मुद्दे उठाने की बजाय कार्यवाही ठप्प करना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। संसद का बजट सत्र भी पिछले सत्रों की तरह लगता है हंगामे की भेंट चढ़ने जा रहा है। सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े हुए है। दूसरी तरफ कुछ राजनैतिक दलों ने स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी की है जिस पर कोई फैसला नहीं हो पा रहा है। संसद में गतिरोध कोई नयी बात नहीं है मगर अब इंतिहा हो गयी है। जड़ता टूटनी ही चाहिए। नेताओं को अपने लाभ हानि की बजाय जनता के कल्याण की सोचनी चाहिए। संसद के पिछले कुछ सत्रों की कार्यवाही पर एक नज़र डालें तो लगेगा संसद में काम कम और हंगामा ज्यादा होता है। जनता के खून पसीने की कमाई हंगामे की भेंट चढ़ जाती है जो किसी भी स्थिति में लोकतंत्र के लिए हितकारी नहीं है। देश की संसद आजकल कामकाज की जगह हंगामे की ज्यादा शिकार हो रही है। संसद आम आदमी की समस्याओं को दूर करेगा। मगर हो रहा है ठीक इसके उल्टा। संसद के पिछले कुछ सत्रों में ऐसा ही कुछ हो रहा है। संसदीय लोकतंत्र में संसद ही सर्वोच्च है। हमारे माननीय संसद सदस्य इस सर्वोच्चता का अहसास कराने का कोई मौका भी नहीं चूकते, पर खुद इस सर्वोच्चता से जुड़ी जिम्मेदारी-जवाबदेही का अहसास करने को तैयार नहीं। बेशक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ऐसी तस्वीर बेहद निराशाजनक ही नहीं, चिंताजनक भी है । संसद ठप रहने की बढ़ती प्रवृत्ति भी कम खतरनाक नहीं है। संसद सत्र अपने कामकाज के बजाय हंगामे के लिए ही समाचार माध्यमों में सुर्खियां बनता जा रहा है। अगर हम संसद की घटती बैठकों के मद्देनजर देखें तो सत्र के दौरान बढ़ता हंगामा और बाधित कार्यवाही हमारे माननीय सांसदों और उनके राजनीतिक दलों के नेतृत्व की लोकतंत्र में आस्था पर ही सवालिया निशान लगा देती है। संसद की सर्वोच्चता का स्पष्ट अर्थ यह भी है कि वह देश हित-जनहित में कानून बनाने के अलावा सरकार के कामकाज की कड़ी निगरानी और समीक्षा भी करे, लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का हाल यह है कि देश का बजट तक बिना चर्चा के पारित हो गया।
संसदीय लोकतंत्र में संसद ही सर्वोच्च है। हमारे माननीय संसद सदस्य इस सर्वोच्चता का अहसास कराने का कोई मौका भी नहीं चूकते, पर खुद इस सर्वोच्चता से जुड़ी जिम्मेदारी-जवाबदेही का अहसास करने को तैयार नहीं। संसद में हंगामा आम बात हो गई है। लोकतंत्र की मूल भावना को इससे बढ़ते खतरे की चर्चा और चिंता मीडिया से लेकर सर्वोच्च अदालत तक मुखर होती रही है। जाहिर है, इस गहराते खतरे के लिए राजनीतिक दलों का नेतृत्व ही जिम्मेदार है, जो अक्सर ऐसी जवाबदेही से मुंह ही चुराने के लिए जाना जाता है। बेशक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ऐसी तस्वीर बेहद निराशाजनक ही नहीं, चिंताजनक भी है, लेकिन संसद ठप रहने की बढ़ती प्रवृत्ति भी कम खतरनाक नहीं है। संसद का वर्तमान बजट सत्र अपने कामकाज के बजाय हंगामे के लिए ही समाचार माध्यमों में सुर्खियां बनता रहा है। अगर हम संसद की घटती बैठकों के मद्देनजर देखें तो सत्र के दौरान बढ़ता हंगामा और बाधित कार्यवाही हमारे माननीय सांसदों और उनके राजनीतिक दलों के नेतृत्व की लोकतंत्र में आस्था पर ही सवालिया निशान लगा देती है। संसद की सर्वोच्चता का स्पष्ट अर्थ यह भी है कि वह देश हित-जनहित में कानून बनाने के अलावा सरकार के कामकाज की कड़ी निगरानी और समीक्षा भी करे, लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का हाल यह है कि देश का बजट तक बिना चर्चा के पारित हो गया।
ऐसे में यह सवाल उठना भी बेहद स्वाभाविक है कि फिर पूरे बजट सत्र के दौरान संसद ने किया क्या है? बार-बार हंगामे के चलते कार्यवाही स्थगित होने से साफ है कि काम तो नहीं ही किया, पर दलगत स्वार्थों से प्रेरित आरोप-प्रत्यारोप लगाने में न सत्तापक्ष पीछे रहा और न ही विपक्ष। सत्ता का खेल बनकर रह गयी राजनीति में आरोप-प्रत्यारोपों की कीचड़ उछाल स्पर्धा अप्रत्याशित नहीं है, लेकिन उसके लिए संसद की कार्यवाही को ही बंधक बना लेना तो लोकतंत्र और जनमत की अवमानना ही है। तर्क दिया जा सकता है कि बिना बहस राष्ट्रपति का अभिभाषण पहली बार तो पारित नहीं किया गया? बेशक काम से ज्यादा हंगामे के लिए पहचानी जाने वाली हमारी राजनीति अतीत में भी बिना चर्चा अभिभाषण पारित करने का कारनामा कर चुकी है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली कारगुजारियों की पुनरावृत्ति करने के बजाय उनसे सबक सीखना ही श्रेयस्कर होता है।

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