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मिठास के नाम पर जहर : त्योहारों में मिलावट का बढ़ता कारोबार

मिठास के नाम पर जहर : त्योहारों में मिलावट का बढ़ता कारोबार

-सुनील कुमार महला
दीपावली खुशियों, उमंग, प्रकाश और मिठास का त्योहार है। इस पर्व पर घर-परिवार में मिठाइयों का आदान-प्रदान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, आत्मीयता और सद्भाव का प्रतीक भी है। दीपावली आने से कई दिन पहले ही बाजार रंग-बिरंगी मिठाइयों से सजने लगते हैं और बाजार में दुकानों पर काजू कतली, बेसन के लड्डू, मोतीचूर, रसगुल्ले, बर्फी, पेड़े और गुलाब जामुन की बहार दिखाई देने लगती है। कभी घरों में भी दीपावली के लिए तरह-तरह के पकवान और मिठाइयां तैयार की जाती थीं, लेकिन बदलती जीवनशैली और व्यस्तता के कारण अब अधिकांश लोग बाजार से ही मिठाइयां खरीदना पसंद करते हैं। यही वह समय है, जब मिठाइयों की मांग अचानक बढ़ जाती है और कुछ मुनाफाखोर इस मांग को कमाई का अवसर बना लेते हैं।विडंबना यह है कि जिस मिठास को हम अपने परिवार और प्रियजनों के साथ बांटने के लिए खरीदते हैं, उसी में मिलावट का खतरा छिपा होता है। मिलावट तो मिलावट, तौल तक में गड़बड़ी की जातीं है और डिब्बे को भी मिठाई के साथ ही तौल दिया जाता है। शुद्ध देसी घी, असली मावे और गुणवत्तापूर्ण दूध से बनी मिठाइयों के नाम पर आज नकली घी, मिलावटी मावा, सिंथेटिक दूध और घटिया खाद्य सामग्री से तैयार मिठाइयां ऊंचे दामों पर बेची जाती हैं। कई बार ग्राहक को यह पता ही नहीं चलता कि वह जिस मिठाई को शुद्ध और स्वादिष्ट समझकर खरीद रहा है, उसमें इस्तेमाल की गई सामग्री उसकी सेहत के लिए कितनी नुकसानदेह हो सकती है। यह केवल उपभोक्ता के साथ आर्थिक धोखाधड़ी नहीं, बल्कि उसके स्वास्थ्य और विश्वास के साथ किया जाने वाला गंभीर अपराध है।


हम सभी जानते हैं कि मिलावट का यह कारोबार केवल मिठाइयों तक ही सीमित नहीं है। दूध, घी, पनीर, मावा, मसाले, तेल, दालें, सूखे मेवे और यहां तक कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कई खाद्य पदार्थ भी इसकी चपेट में हैं। कहीं दूध में पानी और अन्य रासायनिक पदार्थ मिलाए जाते हैं, तो कहीं पनीर और मावा तैयार करने में गैर-मानक सामग्री का इस्तेमाल होता है। मसालों में रंग और अन्य अवांछित पदार्थ मिलाकर उन्हें आकर्षक बनाया जाता है। खाद्य तेलों में मिलावट और नकली ब्रांडों के नाम पर बिक्री की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। त्योहारों के अवसर पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर सरकारी स्तर पर भी चिंता जताई जाती है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने 29 सितंबर 2026 को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पत्र जारी कर नवरात्र और दीपावली के दौरान खाद्य पदार्थों की जांच, निगरानी और नमूने लेने की प्रक्रिया तेज करने के निर्देश दिए। इसमें दूध एवं दुग्ध उत्पादों, मिठाइयों, नमकीन, खाद्य तेल और घी को विशेष निगरानी में रखने को कहा गया लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब हर साल त्योहारों से पहले ऐसे निर्देश जारी होते हैं, तब भी मिलावट का कारोबार आखिर क्यों नहीं रुकता? इस क्रम में हाल के घटनाक्रम इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। दिल्ली में अक्टूबर 2026 के शुरुआती दिनों में खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई के दौरान 4,100 किलोग्राम से अधिक संदिग्ध मिलावटी मावा और पनीर नष्ट किए जाने की खबर सामने आई। इतना ही नहीं, हाल ही में 29 अक्टूबर को भी दिल्ली के तीन बाजारों में छापेमारी के दौरान करीब 949 लीटर घटिया घी जब्त किया गया। वहीं, हरियाणा के मेवात क्षेत्र में भी लगभग 10 हजार किलोग्राम मिलावटी पनीर जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई। राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी दीपावली से पहले घटिया मावे और खाद्य तेल की आपूर्ति रोकने के लिए विशेष जांच अभियान चलाने की तैयारी की गई। अधिकारियों ने माना कि त्योहारों में मांग बढ़ने के कारण आसपास के जिलों से बड़ी मात्रा में घटिया मावा बाजार में पहुंचने का खतरा रहता है। इसी तरह उदयपुर में भी 29 अक्टूबर को लसाड़िया क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई के दौरान 45 किलोग्राम अस्वच्छ मावा और 7 किलोग्राम घटिया मिठाइयां जब्त कर नष्ट किए जाने की खबर सामने आई। वास्तव में, ये घटनाएं बताती हैं कि मिलावट की समस्या किसी एक शहर, प्रदेश या मिठाई की दुकान तक सीमित नहीं है। यह एक संगठित और व्यापक समस्या का रूप ले चुकी है।


वास्तव में, सबसे चिंताजनक बात यह है कि मिलावटखोरों के हौसले केवल इसलिए बुलंद नहीं हैं कि बाजार में खाद्य पदार्थों की मांग अधिक है, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें कानून का पर्याप्त भय नहीं है।यह बात ठीक है कि समय-समय पर छापेमारी होती है, कुछ नमूने भी लिए जाते हैं, कुछ दुकानों से खाद्य सामग्री जब्त होती है और खराब सामग्री नष्ट कर दी जाती है। मीडिया में कार्रवाई की खबरें सुर्खियां बनती हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा ही हो जाता है। असली जरूरत केवल त्योहारों पर दिखावटी सक्रियता की नहीं, बल्कि पूरे वर्ष निरंतर निगरानी और दोषियों के विरुद्ध ऐसी कठोर कार्रवाई की है, जिससे मिलावट का कारोबार करने वालों में कानून का वास्तविक भय पैदा हो।आज सोशल मीडिया का युग है और सोशल मीडिया के इस दौर में मिलावट के कारोबार की तस्वीरें और वीडियो भी अक्सर सामने आते रहते हैं। कहीं नकली मावा बनाने की प्रक्रिया दिखाई जाती है, तो कहीं रासायनिक पदार्थों से दूध तैयार करने और वनस्पति व अन्य वसा मिलाकर घी बनाने के वीडियो प्रसारित होते हैं। ये वीडियो लोगों को विचलित करते हैं और कुछ समय तक चर्चा का विषय भी बने रहते हैं, लेकिन केवल वीडियो वायरल होने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। ऐसे मामलों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के विरुद्ध तत्काल सख़्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर खाद्य सुरक्षा विभाग और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल शिकायतों का इंतजार करना नहीं, बल्कि ऐसी गतिविधियों पर पहले से नजर रखना भी है। यहां यह बात भी बिल्कुल सही है कि देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कानूनों की कमी नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत असुरक्षित खाद्य पदार्थों के उत्पादन और बिक्री पर गंभीर दंड का प्रावधान है। यदि असुरक्षित खाद्य पदार्थ के सेवन से किसी व्यक्ति को चोट पहुंचती है, गंभीर चोट लगती है अथवा मृत्यु होती है तो अपराध की गंभीरता के अनुसार कारावास और जुर्माने की सजा हो सकती है। मृत्यु के मामले में कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। इसके बावजूद कानून का प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब उसकी निष्पक्षता से पालना हो और दोषियों को समय पर सजा मिले। विदेशों में खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता के स्वास्थ्य को लेकर कई देशों ने सख्त निगरानी व्यवस्थाएं विकसित की हैं। वहां खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, उत्पादन प्रक्रिया, भंडारण और बिक्री तक पर निगरानी रखी जाती है। पाठकों को बताता चलूं कि वैश्विक स्तर पर, यूरोपीय संघ में खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता स्वास्थ्य को लेकर दुनिया के सबसे सख्त कानून और निगरानी व्यवस्थाएं हैं। गौरतलब है कि यूरोपियन फूड सेफ्टी अथॉरिटी एहतियाती सिद्धांत’ पर काम करती है, जिसका अर्थ है कि किसी भी खाद्य योजक, रसायन या नए उत्पाद को तब तक बाजार में बिकने की अनुमति नहीं दी जाती, जब तक कि उसका सुरक्षित होना वैज्ञानिक रूप से 100% साबित न हो जाए। यही कारण है कि दुनिया के कई अन्य हिस्सों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाले रसायनों, कीटनाशकों, कृत्रिम रंगों और जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर यूरोप में पूरी तरह से प्रतिबंध है। यूरोपीय देशों (विशेषकर जर्मनी और फ्रांस) के अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया में भी खाद्य मानकों, पैकेजिंग और मिलावट को लेकर अत्यंत कठोर कानून लागू हैं। हमारे देश में भी ऐसी व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की पर्याप्त नियुक्ति, आधुनिक जांच प्रयोगशालाएं, मोबाइल खाद्य परीक्षण वाहन, नियमित निरीक्षण और प्रयोगशालाओं से समयबद्ध जांच रिपोर्ट मिलना जरूरी है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों और प्रतिष्ठानों पर निगरानी रखी जानी चाहिए, जहां बड़े पैमाने पर मावा, पनीर और मिठाइयों का उत्पादन होता है। इतना ही नहीं, खाद्य पदार्थों के नमूने लेकर महीनों तक रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने के बजाय जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया में तेजी लानी होगी।इसके साथ ही उपभोक्ताओं को भी जागरूक होने की जरूरत है। हमें मिठाइयां खरीदते समय विश्वसनीय दुकानों को प्राथमिकता देनी चाहिए, और पैकिंग पर निर्माण एवं उपयोग की अंतिम तिथि, सामग्री और खाद्य लाइसेंस संबंधी जानकारी अवश्य देखनी चाहिए। हमें यह चाहिए कि हम खुले में रखी गई मिठाइयों, अस्वच्छ परिस्थितियों में तैयार खाद्य पदार्थों और असामान्य रंग या गंध वाली सामग्री से बचें तथा केवल चमक-दमक और आकर्षक पैकिंग को ही शुद्धता का प्रमाण न मानें। हमारा यह दायित्व बनता है कि किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट का संदेह होने पर हम खाद्य सुरक्षा विभाग में शिकायत दर्ज कराएं। जागरूक उपभोक्ता भी मिलावट के विरुद्ध एक प्रभावी शक्ति बन सकता है।


अंत में यही कहूंगा कि दीपावली का वास्तविक आनंद तभी है, जब घर में जलने वाले दीपक के साथ जीवन में सुख, स्वास्थ्य और खुशहाली का उजाला भी हो। मिठाई में मिलावट केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक विश्वास के साथ विश्वासघात है। सरकार, प्रशासन, खाद्य सुरक्षा विभाग, मिठाई विक्रेताओं और उपभोक्ताओं, सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। मिलावटखोरों के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि कोई भी मिलावट का दुस्साहस न कर सके। संक्षेप में कहें तो हमें ऐसी दीपावली चाहिए, जिसमें मिठाइयों में मिठास हो, मिलावट का जहर नहीं; खुशियों की रोशनी हो, बीमारियों का अंधकार नहीं।

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