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पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित, जानें नारियल के वृक्ष से मिलने वाली सीख

पीएम मोदी ने साझा किया सुभाषित, जानें नारियल के वृक्ष से मिलने वाली सीख

नई दिल्ली। जीवन में किसी के किए गए उपकार को याद रखना और उसके प्रति आभार जताना अच्छे व्यक्तित्व की पहचान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को संस्कृत के एक प्रसिद्ध सुभाषित के माध्यम से इसी भावना को सामने रखा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह श्लोक साझा करते हुए कृतज्ञता, सेवा और समर्पण के महत्व को रेखांकित किया।

प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया श्लोक है—

“प्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं स्मरन्तः शिरसि निहितभारा नारिकेला नराणाम्। ददति जलमनल्पास्वादमाजीवितान्तं न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति॥”

इसका भावार्थ है कि नारियल का वृक्ष अपने शुरुआती जीवन में मिले थोड़े से जल को भी याद रखता है। वह अपने सिर पर फल का भार सहते हुए जीवनभर मनुष्यों को मधुर जल प्रदान करता है। इसी तरह उदार और सज्जन लोग अपने ऊपर किए गए उपकार को कभी नहीं भूलते।

यह सुभाषित केवल एक काव्यात्मक उदाहरण नहीं, बल्कि जीवन में अपनाए जाने वाले महत्वपूर्ण मूल्य की ओर भी ध्यान दिलाता है। किसी ने कठिन समय में मदद की हो, सही रास्ता दिखाया हो या निस्वार्थ भाव से सहयोग दिया हो, तो उस योगदान को याद रखना चाहिए। कृतज्ञता का अर्थ केवल धन्यवाद कहना नहीं, बल्कि अवसर मिलने पर दूसरों के लिए भी अच्छा काम करना है।

विशेष रूप से बलिदानी महापुरुषों के प्रति आभार व्यक्त करने का भाव इस संदेश को और व्यापक बनाता है। देश और समाज के लिए त्याग करने वाले लोगों के योगदान को याद रखना तथा उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारना उनके प्रति सच्चा सम्मान माना जा सकता है। उनका जीवन सेवा, साहस और समर्पण की प्रेरणा देता है।

'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' से लिया गया श्लोक

प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया यह सुभाषित संस्कृत के प्रसिद्ध संकलन 'सुभाषितरत्नभाण्डागारम्' से संबंधित है। इस ग्रंथ में काव्य, नाटक, पुराण, इतिहास और विभिन्न आख्यानों से चुने गए अनेक सुभाषितों को विषय के अनुसार संकलित किया गया है।

ग्रंथ में मंगलाचरण, सामान्य विषय, राज-संबंधी प्रसंग, चित्रात्मक वर्णन, अन्योक्ति और नवरस जैसे विभिन्न प्रकरणों का उल्लेख मिलता है। इसमें जीवन, समाज, व्यवहार और मानवीय मूल्यों से जुड़े अनेक विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

नारियल के वृक्ष का उदाहरण इस बात को सहज तरीके से समझाता है कि सच्ची उदारता अपने लाभ तक सीमित नहीं रहती। जो व्यक्ति दूसरों से मिले सहयोग को याद रखता है और बदले में समाज के लिए कुछ करने की भावना रखता है, वही कृतज्ञता के वास्तविक अर्थ को समझता है। यही इस सुभाषित का मूल संदेश है।

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