भारत-अमेरिका ट्रेड डील किसानों की बर्बादी का दस्तावेज
मुम्बई। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री श्री सचिन पायलट ने केन्द्रीय संसदीय कार्य मंत्री श्री किरेन रिजिजू द्वारा नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी के लिए इस्तेमाल की गई भाषा की कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा कि श्री रिजिजू की टिप्पणी बेहद अशोभनीय एवं निंदनीय है। प्रतिपक्ष के नेता, जो एक संवैधानिक पद पर हैं, उन्हें देश के लिए खतरा बताना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का घोर उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि विपक्ष का मुख्य काम सरकार से सवाल पूछना और उसकी जवाबदेही तय करना होता है, लेकिन सत्ता पक्ष न केवल उन्हें संसद में बोलने से रोकता है, बल्कि उनका माइक तक बंद कर देता है। श्री पायलट ने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति के पूरे परिवार ने देश की एकता और अखंडता के लिए अपना सर्वाेच्च बलिदान दिया हो, उनके लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाना सरासर अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि श्री किरण रिजिजू को अपना बयान तुरंत वापस लेना चाहिए और इस अमर्यादित आचरण के लिए पूरे देश से सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए। मुम्बई के महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए श्री पायलट कहा कि केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा अमेरिका के साथ किये गया व्यापारिक समझौता किसान विरोधी एवं भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि व्यापार समझौते आर्थिक तरक्की का रास्ता होने चाहिए जो बराबरी की शर्तों पर आधारित हों, लेकिन वर्तमान सरकार ने देश के 140 करोड़ जनमानस की भावनाओं और हितों को दरकिनार कर इसे गुलामी के रास्ते पर धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि इस समझौते ने भारत के कृषि बाजार को अमेरिका के लिए पूरी तरह खोलकर रख दिया है जो हमारे किसानों की रोजी-रोटी पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि ड्यूटी-फ्री मक्का, ज्वार और सोयाबीन के आयात से राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों के करोड़ों किसान बर्बाद हो जाएंगे। कपास के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के साथ हुए त्रिकोणीय घटनाक्रम और अमेरिकी कपास के आयात की अनुमति ने भारत के कपास उत्पादकों को दोहरी मार दी है। इसके साथ ही हिमाचल, कश्मीर और पूर्वाेत्तर के फल व मेवा उत्पादकों के सामने भी अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। श्री पायलट ने कहा कि रूस और ईरान से सस्ता कच्चा तेल न खरीदने का वादा भारत की संप्रभुता से सरासर समझौता है। रूस से सस्ते आयात के कारण भारत ने पिछले वर्षों में लगभग 1.81 लाख करोड़ की बचत की थी, लेकिन अब अमेरिका से महंगा तेल खरीदने की मजबूरी देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर भारी पड़ेगी।