स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती सजगता
अमेरिकन एक्सप्रेस बैंकिंग कार्प के हालिया सर्वेें में एक बात साफ हो गई है कि अब लोगों की स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता पहले से अधिक बढ़ गई है। हांलाकि स्वास्थ्य पर पहले भी ध्यान दिया जाता रहा है पर अब स्वास्थ्य के प्रति लोग अधिक गंभीर होने लगे हैं। अमेरिकन एक्सप्रेस द्वारा समय समय पर सर्वे कराकर लोगों के मूड़ को समझा जाता है। पिछली साल के अंत में कराये गये सर्वें में लोगों का मूड़ साफ हो गया है कि अब लोग स्वास्थ्य, युवावस्था में ही भौतिक संसाधन जुटाने, खान-पान के प्रति सजगता और हेल्दी टीप्स पर जोर देने लगे हैं। अब एक बात साफ हो जानी चाहिए कि कोरोना के बाद देश दुनिया के लोगों की प्राथमिकताओं में तेजी से बदलाव आया है। एक समय था जब लोग बचत को ही प्राथमिकता देते थे। आज लोगों की प्राथमिकता में स्वास्थ्य पहले पायदान पर आ गया है। इसमें भी खासतौर से मानसिक स्वास्थ्य और एक्सरसाइज को लेकर अधिक गंभीर होने लगे हैं। लोगोें में वर्कआउट के प्रति रुझान बढ़ा हैं जबकि एक समय था जब वर्कआउट के लिए जिम जाने को स्टेटस सिंबल माना जाता था। मजे की बात तो यह है कि हालिया एक सर्वें के अनुसार 51 फीसदी लोग कसरत करने की मशीनें घर में ही खरीद कर रखने का विचार रखने लगे हैं ताकि घर पर ही उपयोग किया जा सके। जहां तक बचत की बात है आज लोगों की प्राथमिकता चाहे कर्ज ही लेना पड़े पर घर-कार आदि आधुनिक सुविधायुक्त साधनों मेें निवेश करना भी होती जा रहा है। दरअसल कोरोना के अनुभव के साथ साथ ही आर्थिक उदारीकरण के युग में भागमभाग और अंधी हौड़ के चलते लोग कर्ज के जाल में फंसने को भी सहर्ष तैयार देखे जा रहे हैं। इसका कारण भी आज की नौकरी पेशा जिंदगी, पति-पत्नी दोनों के ही नौकरी में होने, नौकरी के कारण घर से दूर रहकर घर बसाने और एकल परिवार के कारण रहन-सहन और हालातों में तेजी से बदलाव आ रहा है।
अमेरिकन एक्सप्रेस बैंकिंग कार्प द्वारा पिछले दिनों दिसंबर, 2023 में ही किये गये ऑनलाईन सर्वे में सामने आया है कि 76 फीसदी लोगों की पहली प्राथमिकता स्वास्थ्य है। देखा जाए तो कोरोना के बाद का यह बड़ा बदलाव है। इससे पहले स्वास्थ्य के प्रति चिंता तो रहती थी पर इतनी गंभीरता कभी नहीं देखी गई। सामान्य बीमारी को भी लोग अब गंभीरता से लेने लगे हैं। इसे स्वास्थ्य के प्रति सजगता के साथ ही अच्छा संकेेत भी माना जा सकता है। अब तो स्वास्थ्य पैकेज को लेकर नित नई बीमा कंपनियां सामने आ रही है। हांलाकि मेडिकल इंश्योरेंस को निजी अस्पतालों द्वारा आय का साधन बनाना वाद-विवाद का विषय है पर इस समय उस पर चर्चा करना विषयांतर होगा। हांलाकि एक अच्छी बात यह है कि लोगों का पोष्टिक भोजन के प्रति रुझान बढ़ा है। समाज के किसी भी वर्ग का व्यक्ति हो वह आज अच्छा खाने में विश्वास रखने लगा है। बड़े बड़े मॉल तक आम आदमी की पहुंच आसान हो गई है। डी मार्ट, रिलायंस, स्मार्ट बाजार, नेशनल हैण्डलूम, विशाल या इसी तरह के मार्ट में आम आदमी को खरीदारी करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। यह बदलाव का संकेत हैं। भले ही आर्थिक विसमता दिन दूनी बढ़ रही हो पर जिस तरह से माल्स संस्कृति से आम आदमी जुड़ने लगा है उससे तो यह तो साफ हो जाना चाहिए कि इन माल्स ने लोगों में आर्थिक आधार पर भेदभाव या आर्थिक हीनता को दूर करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह सकारात्मक दिशा में बढ़ता कदम है। सर्वे के अनुसार 73 फीसदी लोग हैल्दी फूड पर ज्यादा ध्यान देने पर जोर दिया है।
दरअसल स्वास्थ्य के प्रति सजगता का कारण कोरोना के दौरान सामने आये अनुभव है। कोरोना के कारण जब सब कुछ थम सा गया तब यह बात सामने आ गई कि इम्यूनिटी कमजोर होगी तो फिर आप कभी भी किसी भी गंभीर बीमारी की चपेट में आ सकते हो तो दूसरी और यह भी कि कोरोना ने अपनों से बिछुड़ते और अनादि काल से चले आ रही परंपराओं तक को ताक में रख दिया था। हम कोरोना से प्रभावित अपनों का ही अपने हाथों अंतिम संस्कार तक नहीं कर सकते थे तो घर में किसी के भी कोरोना संक्रमित होने पर एक तरह से देखा जाये तो चंद दिनों के लिए तो समाज यहां तक कि आसपास वालों से भी बहिष्कृत होने का दंश भुगत चुके हैं। आइसोलेशन की पीड़ा को सही मायने में कोरोना ने अच्छी तरह से समझा दिया। वैसे भी देश दुनिया में तेजी से नित नई बीमारियां बढ़ती जा रही है। मच्छर जनित बीमारियां तो अब मौसम के साथ साथ नित नए रुप में अपना प्रभाव दिखाने लगी है। इसके साथ ही लाख दावे किये जाते हो पर इसमें कोई दो राय नहीं कि बीमारियों का ईलाज भी दिन प्रतिदिन महंगा होता जा रहा है। एकाकी जीवन, दिन प्रतिदिन की भागदौड़, अंधी प्रतिस्पर्धा और दूसरे से अधिक पाने की चाहत में शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह की पीड़ा देने लगी है। मानसिक संत्रास, कुंठा, डिप्रेशन, अनिद्रा आदि तो आज की युवा पीढ़ी में आम होती जा रही है और यह सब तो तब है जब लोग स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग होने लगे हैं।
स्वास्थ्य जागरुकता और पहली प्राथमिकता में हेल्थ को रखना अच्छी बात है। यह होना भी चाहिए क्योंकि हमारे यहां तो कहा जाता रहा है कि पहला सुख निरोगी काया। व्यक्ति का मन और तन दोनों विकार रहित होने चाहिए। हांलाकि स्वास्थ्य के साथ ही दूसरी प्राथमिकता में कर्ज लेकर भी निवेश बढ़ाने पर जोर से मानसिक तनाव को आमंत्रित करना भी सामने आ रहा है। लोन की किश्त के चक्कर में मानसिक दबाव स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है। ऐसे में निवेश करना अच्छा है पर कर्ज के मकड़जाल में उलझने से बचने का प्रयास करते हुए निवेश पर जोर दिया जाये तो अधिक सही हो सकता है। केवल देखा देखी व एक दूसरे की होड़ में तनाव को ओढ़ना किसी भी हालत में सही निर्णय नहीं हो सकता। युवा पीढ़ी को इस दिशा में भी सोचना होगा।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा