कच्चे तेल में फिर लगी आग, ब्रेंट 110 डॉलर के करीब पहुंचा
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के बीच ब्रेंट क्रूड 110.08 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। इसमें 0.48 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं, अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 99 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया।
तेल बाजार में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है। निवेशक और कारोबारी इस बात को लेकर सतर्क हैं कि क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर सामने आ रहे बयानों ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ी दुनिया की नजर
ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा अरेफ ने कहा है कि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण जरूरी है। उन्होंने मित्र देशों के लिए इस मार्ग से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की बात भी कही और मौजूदा हालात के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार के सबसे अहम समुद्री मार्गों में शामिल है। दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। ऐसे में यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने या सुरक्षा जोखिम बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ने की आशंका रहती है।
क्षेत्रीय हमलों से बढ़ी आपूर्ति बाधित होने की चिंता
पश्चिम एशिया में सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं ने भी तेल बाजार पर दबाव बढ़ाया है। रिपोर्टों के मुताबिक, यमन में हूती विद्रोहियों की गतिविधियों और सऊदी अरब की ऊर्जा, हवाई अड्डा तथा सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाए जाने की खबरों से क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष का दायरा बढ़ता है, तो तेल उत्पादन, भंडारण और समुद्री परिवहन पर असर पड़ सकता है। इसी आशंका के चलते कारोबारी संभावित आपूर्ति जोखिमों को कीमतों में शामिल कर रहे हैं।
2026 में तेल की कीमतों में बड़ी तेजी
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अब तक करीब 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अमेरिका-ईरान तनाव के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े जोखिम भी वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बनाए हुए हैं।
हालांकि, आपूर्ति को लेकर कुछ राहत भरे संकेत भी सामने आए हैं। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति युद्ध-पूर्व स्तर के लगभग 80 प्रतिशत तक लौट आई है। इसके बावजूद रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।
इराक के तेल मंत्री ने भी बताया कि इस महीने देश का तेल निर्यात 34 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक हो गया है। इराक ने प्रतिस्पर्धी कीमतों और छूट के जरिए अपने निर्यात को बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। इन संकेतों के बावजूद बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत में महंगाई पर पड़ सकता है असर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।
यदि तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो पेट्रोलियम उत्पादों, माल ढुलाई और परिवहन की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इससे खाद्य पदार्थों सहित कई वस्तुओं की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ने की आशंका रहती है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू ईंधन दरों पर कितना पड़ेगा, यह रुपये की विनिमय दर, करों, सरकारी नीतियों और तेल कंपनियों के फैसलों पर भी निर्भर करेगा।
फिलहाल बाजार की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की आपूर्ति पर बनी हुई है। यदि तनाव और बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।