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राजस्थान भाजपा का चाणक्य : आखिर राज्यसभा क्यों नहीं पहुंच पाए राजेंद्र राठौड़?

राजस्थान भाजपा का चाणक्य : आखिर राज्यसभा क्यों नहीं पहुंच पाए राजेंद्र राठौड़?

सात बार विधायक, भाजपा के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार, फिर भी राज्यसभा की सूची से बाहर

राजस्थान की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिनकी पहचान किसी पद से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक कौशल, संगठन क्षमता और रणनीतिक सोच से बनती है। भारतीय जनता पार्टी में राजेंद्र सिंह राठौड़ ऐसा ही एक नाम हैं। करीब तीन दशक से अधिक समय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय राठौड़ न केवल सात बार विधायक रहे हैं, बल्कि भाजपा के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने सत्ता और संगठन दोनों में अपनी मजबूत छाप छोड़ी है। राजस्थान विधानसभा में जब भी भाजपा को किसी मजबूत वक्ता, आक्रामक रणनीतिकार या विपक्ष को घेरने वाले नेता की जरूरत पड़ी, राजेंद्र राठौड़ सबसे आगे दिखाई दिए। यही कारण है कि भाजपा कार्यकर्ता ही नहीं, राजनीतिक विरोधी भी उन्हें राजस्थान भाजपा का "चाणक्य" कहने से नहीं चूकते। लेकिन हाल ही में संपन्न राज्यसभा चुनाव में जब भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा की तो राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर इतना बड़ा नेता राज्यसभा क्यों नहीं पहुंच पाया?

राजनीति में संघर्ष से शिखर तक का सफर

चूरू जिले की धरती से निकलकर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले राजेंद्र राठौड़ ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। भाजपा के संगठनात्मक दौर से लेकर सत्ता के शीर्ष तक वे लगातार सक्रिय रहे। राजस्थान विधानसभा में उनकी पहचान केवल एक विधायक की नहीं रही, बल्कि ऐसे नेता की रही जो सरकार चलाने और विपक्ष को संभालने दोनों की क्षमता रखता है। वसुंधरा राजे सरकार में संसदीय कार्य मंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया, वहीं कांग्रेस शासन के दौरान नेता प्रतिपक्ष के रूप में सरकार को लगातार घेरते रहे। उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है उनकी राजनीतिक तैयारी। विधानसभा में किसी भी विषय पर तथ्यात्मक और आक्रामक प्रस्तुति के कारण वे हमेशा भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे।

भाजपा के संकटमोचक नेता

राजेंद्र राठौड़ की पहचान केवल चुनाव जीतने वाले नेता की नहीं है। भाजपा के भीतर उन्हें संकटमोचक के रूप में भी देखा जाता है। जब-जब पार्टी को कठिन राजनीतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, तब-तब राठौड़ ने संगठन और नेतृत्व के बीच सेतु का काम किया। प्रदेश के लगभग हर जिले में उनकी राजनीतिक पकड़ और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है। यही कारण है कि राजस्थान भाजपा में संगठन से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक उनकी बात को गंभीरता से सुना जाता है।

2023 की हार के बाद भी कम नहीं हुआ कद

2023 विधानसभा चुनाव में तारानगर सीट से मिली हार को कई लोगों ने उनके राजनीतिक भविष्य के लिए झटका माना था। लेकिन चुनाव परिणामों के बाद की परिस्थितियों ने साबित कर दिया कि राजनीति में केवल चुनाव जीतना ही कद तय नहीं करता। हार के बाद भी भाजपा के बड़े कार्यक्रमों, संगठनात्मक बैठकों और चुनावी रणनीतियों में उनकी सक्रिय भूमिका बनी रही। पार्टी के भीतर उनका प्रभाव पहले की तरह कायम रहा। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि कोई नेता हार के बाद भी उतना ही प्रभावशाली बना रहे, तो यह उसकी व्यक्तिगत राजनीतिक क्षमता का प्रमाण होता है।

बंगाल में भी दिखा राजनीतिक कौशल

राजेंद्र राठौड़ का प्रभाव केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। भाजपा समय-समय पर उन्हें दूसरे राज्यों के चुनावी अभियानों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देती रही है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में हुए चुनावी अभियान के दौरान भी उनकी भूमिका चर्चा का विषय रही। भाजपा ने उन्हें महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रणनीतिक जिम्मेदारियां सौंपीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक समन्वय में उनकी क्षमता के कारण केंद्रीय नेतृत्व लगातार उन पर भरोसा करता है। यही वजह थी कि राज्यसभा चुनाव की चर्चा शुरू होते ही अधिकांश राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने माना कि यदि किसी एक नाम पर सबसे अधिक सहमति बन सकती है तो वह राजेंद्र राठौड़ का नाम होगा।

फिर राज्यसभा क्यों नहीं?

यहीं से राजनीति का सबसे दिलचस्प प्रश्न शुरू होता है। राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने जिन नामों पर अंतिम मुहर लगाई, उनमें राजेंद्र राठौड़ शामिल नहीं थे। यह निर्णय राजनीतिक हलकों में आश्चर्य का विषय बना। हालांकि भाजपा ने इसके पीछे कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हो सकते हैं। पहला कारण सामाजिक संतुलन है। राजस्थान की राजनीति में जाट, गुर्जर, राजपूत, ओबीसी और अनुसूचित वर्गों का बड़ा प्रभाव है। भाजपा ने इस बार राज्यसभा में ऐसे चेहरों को प्राथमिकता दी जिनके माध्यम से आगामी चुनावों के लिए नए सामाजिक समीकरण साधे जा सकें। दूसरा कारण यह माना जा रहा है कि पार्टी अभी भी राजेंद्र राठौड़ को राजस्थान की सक्रिय राजनीति में बनाए रखना चाहती है। राज्यसभा भेजने की बजाय संगठन और चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका अधिक उपयोगी मानी जा रही हो सकती है। तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि भाजपा 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर प्रदेश में कुछ अनुभवी नेताओं को मैदान में ही बनाए रखना चाहती है।

क्या अभी बाकी है बड़ी भूमिका?

राजनीति में कई बार पद से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राजेंद्र राठौड़ का राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और चुनावी रणनीति उन्हें भाजपा के लिए आज भी महत्वपूर्ण बनाती है। राजस्थान भाजपा में यदि भविष्य के नेतृत्व, संगठन विस्तार या चुनावी रणनीति की बात होती है तो राठौड़ का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। यही कारण है कि राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने के बावजूद उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं माना जा रहा। बल्कि भाजपा के कई कार्यकर्ताओं और नेताओं का मानना है कि उनके लिए भविष्य में कोई और बड़ी जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

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