परंपरा से हटकर सोच, फैंटेसी ड्रामा ‘राहु केतु’ में मिलेगा नया अनुभव
मुंबई। जिस दौर में फैंटेसी फिल्मों को अक्सर पौराणिक कथाओं या धार्मिक संदर्भों से जोड़कर देखा जाता है, उसमें राहु केतु जानबूझकर एक ऐसी राह चुनती है, जहां उसकी कहानी किसी मिथकीय कथा या धार्मिक पुनर्कथन पर आधारित नहीं, बल्कि कल्पना, विश्वास प्रणालियों और मानवीय टकरावों से प्रेरित हो। इसे एक न्यू-एज फैंटेसी ड्रामा भी कहा जा सकता है। गौरतलब है कि राहु केतु में फैंटेसी को प्रतीकात्मक सहारे की तरह नहीं, बल्कि कहानी कहने के एक सशक्त माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया है। फिल्म की दुनिया कल्पनाशील होने के साथ-साथ समकालीन और भावनात्मक रूप से जमीन से जुड़ी हुई है। इसकी कहानी इस बात की पड़ताल करती है कि व्यक्तिगत, सामाजिक या मानसिक स्तर पर मौजूद विश्वास किस तरह इंसानी व्यवहार और नैतिक फैसलों को प्रभावित करते हैं। फैंटेसी के तत्व ड्रामा को गहराई देते हैं, लेकिन फिल्म का मूल केंद्र मानवीय भावनाएं और आंतरिक संघर्ष ही हैं। राहु केतु की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह फैंटेसी को आस्था से अलग रखने की कोशिश करती है। साथ ही फिल्म परिचित पौराणिक ढांचों पर निर्भर रहने की बजाय अपनी खुद की एक नई दुनिया रचती है, जहां विचार, कल्पना और भावनात्मक दांव कहानी को आगे बढ़ाते हैं। यही वजह है कि फिल्म आधुनिक, सहज और आज के दर्शकों से सीधे जुड़ने वाली महसूस होती है, जो उम्र और विश्वास की सीमाओं से परे जाती है।
बी-लाइव प्रोडक्शन के सह-ससंथापक और फिल्म के निर्माता सूरज सिंह इस रचनात्मक सोच को परिभाषित करते हुए कहते हैं, राहु केतु एक फैंटेसी ड्रामा है, जो विचारों से प्रेरित है, लेकिन मिथक से बंधा नहीं है। हालांकि हम शुरू से ही यह बात साफ रखना चाहते थे कि हम किसी धार्मिक कहानी को दोहराना नहीं चाहते, बल्कि इस फिल्म को फैंटेसी के जरिए विश्वास प्रणालियों और मानवीय टकरावों को एक समकालीन, भावनात्मक और सार्वभौमिक अंदाज़ में पेश करना चाहते हैं।
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वे यह बात भी साफा करते हैं कि इस जॉनर ने उन्हें सीमाओं के बजाय रचनात्मक आज़ादी दी। इस सिलसिले में वे कहते हैं, फैंटेसी हमें डर, शक्ति, आस्था और चुनाव जैसे विषयों पर बात करने की आज़ादी देती है, लेकिन ऐसे किरदारों और परिस्थितियों के जरिए, जिनसे दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ सकें। अपने मूल में, राहु केतु एक मानवीय कहानी है, जिसे कल्पनाशील दृष्टि से कहा गया है।
हिंदी सिनेमा में फैंटेसी के मायने को नए सिरे से परिभाषित करती हुई, राहु केतु खुद को प्रतीकों से नहीं, बल्कि मजबूत कहानी कहने की क्षमता से पहचान दिलाती है। यह न देवताओं की कहानी है, न ही पौराणिक घटनाओं की, बल्कि यह विचारों, कल्पना और मानवीय संवेदनाओं की कहानी है।
अपनी इस अलग पहचान के साथ, राहु केतु फैंटेसी जॉनर को लेकर एक नई बातचीत शुरू करने की कोशिश करती है। ऐसी बातचीत जो भावना, प्रासंगिकता और मौलिकता से जुड़ी हो। यह एक ऐसी फिल्म है, जो केवल दृश्य भव्यता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है और फिल्म खत्म होने के बाद भी उनके साथ बनी रहती है।