आभासी दुनिया से बचपन को सुरक्षित रखने की पहल
-ललित गर्ग
डिजिटल युग में मानव जीवन की गति और स्वरूप तेजी से बदल रहा है। संचार, शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संबंधों का बड़ा हिस्सा अब आभासी माध्यमों के सहारे संचालित होने लगा है। इस परिवर्तन ने जहां अनेक सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के मानसिक, शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। इसी संदर्भ में भारत के तकनीकी रूप से अग्रणी राज्य कर्नाटक ने एक महत्वपूर्ण और अनुकरणीय पहल करते हुए सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों को सामाजिक माध्यमों के उपयोग से दूर रखने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट सत्र में यह घोषणा की कि किशोर आयु वर्ग के बच्चों द्वारा सामाजिक माध्यमों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए कठोर नियम बनाए जाएंगे। यह निर्णय अभिभावकों की उस चिंता को कम करता है जो अनियंत्रित डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले जोखिम से परेशान थे। जिसमें साइबर बुलिंग व साइबर धोखाधड़ी भी शामिल है। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को आभासी दुनिया के दुष्प्रभावों से बचाना और उनके स्वस्थ मानसिक विकास को सुनिश्चित करना है। एक अनुकरणीय पहल है, जिससे प्रेरणा लेते हुए अन्य प्रांतों को भी बचपन को सोशल मीडिया के खतरों से बचाने की दिशा में सार्थक उपक्रम करने चाहिए।
कर्नाटक की इस पहल के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी विधानसभा में घोषणा की कि राज्य में तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चों द्वारा सामाजिक माध्यमों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए आगामी नब्बे दिनों के भीतर कानून बनाया जाएगा। इस प्रकार आंध्र प्रदेश कर्नाटक के बाद ऐसा निर्णय लेने वाला दूसरा राज्य बनने जा रहा है। इन दोनों राज्यों की पहल केवल प्रशासनिक निर्णय भर नहीं है, बल्कि यह तेजी से आभासी होती दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चल रही वैश्विक बहस का हिस्सा भी है। विश्व के अनेक देशों में इस विषय पर गंभीर चिंतन हो रहा है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में पहले ही सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों के उपयोग पर प्रतिबंध लागू किया जा चुका है, वहीं फ्रांस जैसे देशों में भी बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर कठोर नियम बनाए जा रहे हैं। वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में अनेक मनोवैज्ञानिकों और बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लगातार चेतावनी दी है कि सामाजिक माध्यमों का अनियंत्रित उपयोग किशोरों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। बच्चों में आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, चिंता, अवसाद, ध्यान भंग होने की प्रवृत्ति तथा आक्रामक व्यवहार जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। आभासी मंचों पर लगातार तुलना और प्रदर्शन की प्रवृत्ति के कारण बच्चों के मन में हीनता और असंतोष की भावना भी जन्म लेने लगती है। यही कारण है कि भारत सरकार के 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस विषय को गंभीर चिंता के रूप में रेखांकित किया गया था।
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार किशोरों का औसत दैनिक स्क्रीन समय लगातार बढ़ रहा है। अनेक सर्वेक्षण बताते हैं कि कई देशों में तेरह से अठारह वर्ष आयु वर्ग के बच्चे प्रतिदिन तीन से छह घंटे तक आभासी माध्यमों पर समय बिताते हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी पढ़ाई, नींद, पारिवारिक संवाद और शारीरिक गतिविधियों पर पड़ता है। ध्यान और एकाग्रता की क्षमता में कमी आने से अध्ययन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बच्चों का स्वाभाविक बचपन, जो खेलकूद, मित्रता और प्रकृति के साथ जुड़ाव से समृद्ध होता है, वह धीरे-धीरे कृत्रिम आभासी संसार में सिमटता जा रहा है। इसके अतिरिक्त आभासी माध्यमों के माध्यम से साइबर उत्पीड़न और साइबर धोखाधड़ी जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। कई बार बच्चे अनजाने में ऐसे जाल में फंस जाते हैं जिससे उनका मानसिक संतुलन और सुरक्षा दोनों प्रभावित होते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध अनुचित सामग्री भी बच्चों के मनोविज्ञान पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए आभासी दुनिया के बढ़ते प्रचलन पर केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस नीतिगत कदम उठाने की आवश्यकता है।
हालांकि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल सराहनीय है, किंतु इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर अनेक व्यावहारिक प्रश्न भी सामने आते हैं। आज के समय में स्मार्टफोन और विभिन्न अनुप्रयोग शिक्षा और दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। अनेक विद्यालय असाइनमेंट, सूचना और संवाद के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हैं। ऐसे में यह निर्धारित करना कठिन हो सकता है कि किसी बच्चे द्वारा किया गया उपयोग शैक्षिक उद्देश्य से है या सामाजिक उद्देश्य से। दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न आयु सत्यापन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। यह सुनिश्चित करना कि कोई बच्चा वास्तव में तेरह या सोलह वर्ष से कम आयु का है, तकनीकी दृष्टि से एक जटिल कार्य है। यदि तकनीकी कंपनियां इस दिशा में सहयोग नहीं करती हैं तो नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन हो सकता है। अनेक परिवारों में एक ही मोबाइल फोन का उपयोग परिवार के कई सदस्य करते हैं, ऐसे में बच्चों द्वारा सामाजिक माध्यमों तक पहुंच को पूरी तरह रोकना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी इन कठिनाइयों के बावजूद यह पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाज को एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाती है। वास्तव में बच्चों को आभासी माध्यमों के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि एक संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण एवं जागरूकता अभियान अपनाना आवश्यक होगा। इसमें सरकारों, विद्यालयों, तकनीकी मंचों और अभिभावकों की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
सरकारों को चाहिए कि वे बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए स्पष्ट नीतियां बनाएं और तकनीकी कंपनियों के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें बच्चों की आयु का सत्यापन प्रभावी ढंग से किया जा सके। विद्यालयों को भी छात्रों को डिजिटल अनुशासन और जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करना चाहिए। अभिभावकों की भूमिका तो सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों के व्यवहार और आदतों का निर्माण परिवार में ही होता है। यदि माता-पिता स्वयं डिजिटल संयम का उदाहरण प्रस्तुत करें और बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें, तो आभासी माध्यमों के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके साथ ही बच्चों को रचनात्मक और सृजनात्मक वातावरण प्रदान करना भी आवश्यक है। खेलकूद, पठन-पाठन, संगीत, कला और प्रकृति के साथ जुड़ाव जैसी गतिविधियां बच्चों के व्यक्तित्व को संतुलित और समृद्ध बनाती हैं। यदि बचपन में ही इन सकारात्मक आदतों का विकास किया जाए तो बच्चे स्वाभाविक रूप से आभासी माध्यमों पर निर्भरता से दूर रह सकते हैं। समाज को भी इस दिशा में सकारात्मक पहल करनी चाहिए ताकि बच्चों के लिए स्वस्थ और प्रेरणादायक वातावरण तैयार किया जा सके।
आज यह स्पष्ट हो चुका है कि डिजिटल क्रांति के साथ-साथ डिजिटल अनुशासन की भी आवश्यकता है। तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को समृद्ध बनाना होना चाहिए, न कि उसे मानसिक और सामाजिक संकटों की ओर धकेलना। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण चेतावनी और प्रेरणा दोनों है। यदि अन्य राज्य भी इससे प्रेरणा लेकर बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं और केंद्र सरकार इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर का कानून बनाने पर विचार करे, तो यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है। लगातार बिगड़ती स्थितियों के बीच निश्चित तौर पर केंद्र सरकार को भी देश में एक केंद्रीय कानून लाने को बाध्य होना पड़ सकता है। वहीं केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर विषय विशेषज्ञों और समाज के विभिन्न वर्गों से भी राय लेनी चाहिए। ऐसे वक्त में जब बच्चों का स्क्रीन टाइम एक लत के रूप में लगातार बढ़ा है तथा उनकी एकाग्रता कम होने से पढ़ाई बाधित हो रही है, तो इस संकट का समाधान केंद्र व राज्यों की प्राथमिकता होनी चाहिए। वास्तव में बच्चों का बचपन केवल आभासी दुनिया में खो जाने के लिए नहीं है। उनका बचपन कल्पनाओं, खेल, सीखने और सृजन की संभावनाओं से भरा हुआ होना चाहिए। यदि समाज और शासन मिलकर यह सुनिश्चित कर सकें कि बच्चों का बचपन सुरक्षित, संतुलित और सृजनात्मक वातावरण में विकसित हो, तभी हम एक स्वस्थ, संवेदनशील और सशक्त भविष्य की कल्पना कर सकते हैं।